वांछित मन्त्र चुनें

यस्य॒ त्यत्ते॑ महि॒मानं॒ मदे॑ष्वि॒मे म॒ही रोद॑सी॒ नावि॑विक्ताम् । तदोक॒ आ हरि॑भिरिन्द्र यु॒क्तैः प्रि॒येभि॑र्याहि प्रि॒यमन्न॒मच्छ॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yasya tyat te mahimānam madeṣv ime mahī rodasī nāviviktām | tad oka ā haribhir indra yuktaiḥ priyebhir yāhi priyam annam accha ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यस्य॑ । त्यत् । ते॒ । म॒हि॒मान॑म् । मदे॑षु । इ॒मे इति॑ । म॒ही इति॑ । रोद॑सी॒ इति॑ । न । अवि॑विक्ताम् । तत् । ओकः॑ । आ । हरि॑ऽभिः । इ॒न्द्र॒ । यु॒क्तैः । प्रि॒येभिः॑ । या॒हि॒ । प्रि॒यम् । अन्न॑म् । अच्छ॑ ॥ १०.११२.४

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:112» मन्त्र:4 | अष्टक:8» अध्याय:6» वर्ग:12» मन्त्र:4 | मण्डल:10» अनुवाक:9» मन्त्र:4


0 बार पढ़ा गया

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्र) हे परमात्मन् ! (यस्य ते) जिस तेरे (मदेषु) बहुत प्रकार के हर्षों में (त्यत्-महिमानम्) उस प्रादुर्भूत प्रताप को (इमे मही) ये बड़े भारी (रोदसी) रोधनशील खगोल के परिधिरूप-आकाश भूमि (न-अविविक्ताम्) रिक्त नहीं कर सकते हैं अथवा तुझसे पृथक् नहीं करते हैं (युक्तैः) योगयुक्त (प्रियेभिः) प्रिय (हरिभिः) उपासक मनुष्यों के द्वारा उपासित हुआ तू (प्रियम्-अन्नम्-अच्छ) प्रिय उपासनारूप अन्नपान को लक्ष्य करके (तत्-ओकः) उन योगयुक्त उपासकों के उस हृदयस्थान को प्राप्त हो ॥४॥
भावार्थभाषाः - संसार के परिधिरूप ऊपर नीचे के दो स्तर तेरे प्रताप को रिक्त-खाली या तुझसे अलग नहीं कर सकते हैं, तेरे हर्षों के निमित्त आनन्दरसों में उपासक योगियों के द्वारा तू प्रिय उपासनारस को लक्ष्य करके उनके हृदय में साक्षात् होता है ॥४॥
0 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

ज्ञान-शक्ति तथा भक्ति

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यस्य) = जिस (ते) = तेरी (त्यत्) = प्रसिद्ध (महिमानम्) = महिमा को, इमे ये (मही रोदसी) = महत्त्वपूर्ण उत्कर्ष को प्राप्त हुए हुए (द्यावापृथिवी) = द्युलोक व पृथिवीलोक (मदेषु) = मदों में (न अविविक्ताम्) = पृथक् नहीं करते हैं । (तद् ओकः) = वस्तुतः वही घर है । यहाँ द्यावापृथिवी से अभिप्राय मस्तिष्क व शरीर है। महिमा का भाव 'मह पूजायाम्' से 'पूजा की वृत्ति' है । मस्तिष्क को ज्ञान का गर्व हो जाता है जबकि मनुष्य प्रभु को भूल जाता है। इसी प्रकार प्रभु की विस्मृति में शरीर को शक्ति का गर्व हो जाता है । परन्तु यदि 'ज्ञान व शक्ति' प्रभु की पूजा को अपने से पृथक् न करें और ये तीनों ही चीजें एकत्रित हो जाएँ तो शरीर रूप गृह बड़ा सुन्दर बन जाता है । 'मस्तिष्क में ज्ञान, शरीर में शक्ति, हृदय में प्रभु की महिमा [ = पूजा की भावना] ' बस और क्या चाहिए? ऐसा होने पर यह शरीर गृह सुन्दरतम प्रतीत होने लगता है। गृह तो वही गृह है 'तद् ओकः ' । [२] प्रभु कहते हैं कि हे (इन्द्र) = जितेन्द्रिय पुरुष ! ऐसे शरीर गृह को प्राप्त करने के लिए (युक्तैः) = अपने-अपने कार्य में जुटे हुए (प्रियेभिः) = अत्यन्त प्रीणनकारी [कान्त व सुन्दर] (हरिभिः) = इन्द्रियाश्वों से (प्रियम्) = तृप्तिजनक व चाहने योग्य (अन्नम्) = सात्त्विक अन्न को (अच्छ) = लक्ष्य करके (आयाहि) = तू समन्तात् प्राप्त हो । शरीर गृह को सुन्दर बनाने के लिए आवश्यक है कि [क] पुरुष जितेन्द्रिय हो [इन्द्र], [ख] इन्द्रियों को कार्य व्यापृत व प्रिय बनाया जाए [युक्तैः प्रियेभि], [ग] अकर्मण्यता न हो [आयाहि], [घ] सात्त्विक अन्न का ही सेवन किया जाए [प्रियमन्नम् अच्छ] ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - शरीर रूप गृह का सौन्दर्य इस बात में है कि मस्तिष्क में गर्वरहित ज्ञान हो शरीर में इसी प्रकार शक्ति तथा हृदय में भक्ति ।
0 बार पढ़ा गया

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्र) हे परमात्मन् ! (यस्य ते) यस्य तव (मदेषु) बहुविधहर्षेषु (त्यत्-महिमानम्) प्रादुर्भूतं तम् ‘लिङ्गव्यत्ययः’ प्रतापम् “महिमा प्रतापः” [यजु० २३।१५ दयानन्दः] (इमे मही रोदसी) एते महत्यौ रोधनशीले खगोले परिधिभूते द्यावापृथिव्यौ (न-अविविक्ताम्) न रिक्तीकर्त्तुं यद्वा न त्वत्तः पृथक् कर्त्तुं शक्नुतः (युक्तैः) योगयुक्तैः (प्रियेभिः) प्रियैः (हरिभिः) उपासकमनुष्यैः “हरयः-मनुष्यनाम” [निघ० २।३] उपासितः (प्रियम्-अन्नम्-अच्छ) प्रियमुपासनारूपमन्नं दानमभिलक्ष्य (तत्-ओकः) तेषामुपासकानां योगयुक्तानां हृदयस्थानं प्राप्नुहि ॥४॥
0 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indra, whose grandeur in the state of divine ecstasy even the great heaven and earth do not comprehend, exalted in that very halo and glory of ecstasy, come by the dear golden radiations of divinity harnessed to your chariot and well enjoy the presentations of our homage, the food cherished by Divinity.