पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यस्य) = जिस (ते) = तेरी (त्यत्) = प्रसिद्ध (महिमानम्) = महिमा को, इमे ये (मही रोदसी) = महत्त्वपूर्ण उत्कर्ष को प्राप्त हुए हुए (द्यावापृथिवी) = द्युलोक व पृथिवीलोक (मदेषु) = मदों में (न अविविक्ताम्) = पृथक् नहीं करते हैं । (तद् ओकः) = वस्तुतः वही घर है । यहाँ द्यावापृथिवी से अभिप्राय मस्तिष्क व शरीर है। महिमा का भाव 'मह पूजायाम्' से 'पूजा की वृत्ति' है । मस्तिष्क को ज्ञान का गर्व हो जाता है जबकि मनुष्य प्रभु को भूल जाता है। इसी प्रकार प्रभु की विस्मृति में शरीर को शक्ति का गर्व हो जाता है । परन्तु यदि 'ज्ञान व शक्ति' प्रभु की पूजा को अपने से पृथक् न करें और ये तीनों ही चीजें एकत्रित हो जाएँ तो शरीर रूप गृह बड़ा सुन्दर बन जाता है । 'मस्तिष्क में ज्ञान, शरीर में शक्ति, हृदय में प्रभु की महिमा [ = पूजा की भावना] ' बस और क्या चाहिए? ऐसा होने पर यह शरीर गृह सुन्दरतम प्रतीत होने लगता है। गृह तो वही गृह है 'तद् ओकः ' । [२] प्रभु कहते हैं कि हे (इन्द्र) = जितेन्द्रिय पुरुष ! ऐसे शरीर गृह को प्राप्त करने के लिए (युक्तैः) = अपने-अपने कार्य में जुटे हुए (प्रियेभिः) = अत्यन्त प्रीणनकारी [कान्त व सुन्दर] (हरिभिः) = इन्द्रियाश्वों से (प्रियम्) = तृप्तिजनक व चाहने योग्य (अन्नम्) = सात्त्विक अन्न को (अच्छ) = लक्ष्य करके (आयाहि) = तू समन्तात् प्राप्त हो । शरीर गृह को सुन्दर बनाने के लिए आवश्यक है कि [क] पुरुष जितेन्द्रिय हो [इन्द्र], [ख] इन्द्रियों को कार्य व्यापृत व प्रिय बनाया जाए [युक्तैः प्रियेभि], [ग] अकर्मण्यता न हो [आयाहि], [घ] सात्त्विक अन्न का ही सेवन किया जाए [प्रियमन्नम् अच्छ] ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - शरीर रूप गृह का सौन्दर्य इस बात में है कि मस्तिष्क में गर्वरहित ज्ञान हो शरीर में इसी प्रकार शक्ति तथा हृदय में भक्ति ।