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यस्ते॒ रथो॒ मन॑सो॒ जवी॑या॒नेन्द्र॒ तेन॑ सोम॒पेया॑य याहि । तूय॒मा ते॒ हर॑य॒: प्र द्र॑वन्तु॒ येभि॒र्यासि॒ वृष॑भि॒र्मन्द॑मानः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yas te ratho manaso javīyān endra tena somapeyāya yāhi | tūyam ā te harayaḥ pra dravantu yebhir yāsi vṛṣabhir mandamānaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यः । ते॒ । रथः॑ । मन॑सः । जवी॑यान् । आ॒ । इ॒न्द्र॒ । तेन॑ । सो॒म॒ऽपेया॑य । या॒हि॒ । तूय॑म् । आ । ते॒ । हर॑यः । प्र । द्र॒व॒न्तु॒ । येभिः॑ । यासि॑ । वृष॑ऽभिः । मन्द॑मानः ॥ १०.११२.२

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:112» मन्त्र:2 | अष्टक:8» अध्याय:6» वर्ग:12» मन्त्र:2 | मण्डल:10» अनुवाक:9» मन्त्र:2


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्र) हे ऐश्वर्यवन् परमात्मन् ! (ते रथः) तेरा रमणधर्म (मनसः-जवीयान्) मन से भी अधिक वेगवाला है-क्षण से भी पूर्व उपासक के प्रति पहुँच जाता है (तेन) उसके साथ (सोमपेयाय) उपासनारस पान करने के लिये-अङ्गीकार करने के लिये (तूयम्) शीघ्र (आ याहि) आजा (ते हरयः) तेरे स्तोता जन (प्र द्रवन्तु) तेरी स्तुति करें-करते हैं (येभिः) जिन (वृषभिः) स्तुतिवर्षकों के द्वारा (मन्दमानः) स्तुति में लाया जाता हुआ (आ यासि) उनके हृदय में प्राप्त होता है ॥२॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा का रमणीय आनन्दधर्म मन से भी अधिक वेगवान् है, जो उपासक में क्षण से भी पहले विद्यमान हो जाता है, परन्तु जब कि उपासक उसके प्रति आत्मभाव से उपासनारस समर्पित करता है, तो वह उसके हृदय में बस जाता है ॥२॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सोमरक्षण से सशक्तता व प्रसन्नता

पदार्थान्वयभाषाः - [१] प्रभु अपने सखा जीव को प्रेरणा देते हैं कि इन्द्र-हे जितेन्द्रिय पुरुष ! यः = जो ते-तेरा रथ: - यह शरीररूप रथ है, जो रथ मनसः जवीयान् मन से भी अधिक वेगवान् है, अर्थात् खूब शक्ति सम्पन्न है, तेन उस रथ के हेतु से, उस रथ की शक्ति को स्थिर बनाए रखने के लिए सोमपेयाय= सोम के शरीर में ही पान करने के लिए याहि तू गतिशील हो । तेरा सारा प्रयत्न सोम को शरीर में सुरक्षित करने के लिए हो। [२] ते हरयः - तेरे ये इन्द्रियाश्व तूयम् - शीघ्रता से आप्रद्रवन्तु समन्तात् अपने-अपने कार्यों में प्रवृत्त हों । वस्तुतः इनके स्वकार्य में प्रवृत्त होने से ही हम वासनाओं से बचते हैं और सोम का रक्षण कर पाते हैं । उन इन्द्रियाश्वों से तू कार्यों में प्रवृत्त हो येभिः वृषभिः - जिन शक्तिशाली इन्द्रियाश्वों से मन्दसानः = हर्ष का अनुभव करता हुआ याहि तू यासि = गति करता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोमरक्षण से शरीर-रथ ठीक सशक्त बना रहता है। इस सोमरक्षण से ही इन्द्रियाँ शक्तिशाली बनकर स्वकार्यों में प्रवृत्त होती हुई हमारे जीवनों को सुखी बनाती हैं ।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्र) हे ऐश्वर्यवन् परमात्मन् ! (ते रथः-मनसः-जवीयान्) तव रमणधर्मः-उपासकं रमणशीलगुणो मनसोऽपि वेगवान्-अस्ति, क्षणात्पूर्वमपि खलूपासकं प्रति गच्छति (तेन सोमपेयाय तूयम्-आ याहि) तेन सह उपासनारसस्य पानायाङ्गीकरणाय शीघ्रमागच्छ (ते हरयः-प्र द्रवन्तु) तव स्तोतारो मनुष्याः “हरयः-मनुष्यनाम” [निघ० २।३] स्तुतिं कुर्वन्ति (येभिः-वृषभिः-मन्दमानः-आ यासि) यैः स्तुतिवर्षकैः स्तूयमानः “मदति अर्चतिकर्मा” [निघ० ३।१४] “मदिस्तुतिमोद…” [भ्वादि०] तेषां हृदये प्राप्तो भवसि ॥२॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indra, come by that chariot of yours which is faster than the mind, come to taste the sweets of our soma of adoration and prayer. May the horses of your chariot instantly turn and speed hither, mighty horses by which, all happy and blissful, you come and bless the devotees.