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दू॒रं किल॑ प्रथ॒मा ज॑ग्मुरासा॒मिन्द्र॑स्य॒ याः प्र॑स॒वे स॒स्रुराप॑: । क्व॑ स्वि॒दग्रं॒ क्व॑ बु॒ध्न आ॑सा॒मापो॒ मध्यं॒ क्व॑ वो नू॒नमन्त॑: ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

dūraṁ kila prathamā jagmur āsām indrasya yāḥ prasave sasrur āpaḥ | kva svid agraṁ kva budhna āsām āpo madhyaṁ kva vo nūnam antaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

दू॒रम् । किल॑ । प्र॒थ॒माः । ज॒ग्मुः॒ । आ॒सा॒म् । इन्द्र॑स्य । याः । प्र॒ऽस॒वे । स॒स्रुः । आपः॑ । क्व॑ । स्वि॒त् । अग्र॑म् । क्व॑ । बु॒ध्नः । आ॒सा॒म् । आपः॑ । मध्य॑म् । क्व॑ । वः॒ । नू॒नम् । अन्तः॑ ॥ १०.१११.८

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:111» मन्त्र:8 | अष्टक:8» अध्याय:6» वर्ग:11» मन्त्र:3 | मण्डल:10» अनुवाक:9» मन्त्र:8


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (आसाम्) इन व्यापनशील परमाणुधाराओं के मध्य में या आप्त मनुष्यप्रजाओं के मध्य में (याः आपः) जो आप्त प्रजाएँ या परमाणुधाराएँ (इन्द्रस्य) परमात्मा के (प्रसवे) प्रशासन में या ऐश्वर्य के निमित्त (सस्रुः) प्रगति करते हैं या प्राप्ति करते हैं (प्रथमाः प्रथम प्रादुर्भूत हुए या प्रमुख श्रेष्ठ बने (दूरं किल जग्मुः) दूर स्थान या जगत् से दूर मोक्ष को जाते हैं (आपः) व्यापनशील परमाणुधाराएँ या आप्त प्रजाएँ (आसाम्) इनमें से (क्व स्वित्-अग्रम्) तुम्हारे में आगे कौन है (क्व बुध्नः) कौन आधार है (क्व मध्यम्) मध्य कहाँ है (क्व नूनं वः-अन्तः) तुम्हारे में कहाँ अन्त है-अन्त में कौन है ? ॥८॥
भावार्थभाषाः - सृष्टिरचना में परमात्मा ने परमाणुओं में से किन्हीं परमाणुओं को ऊँचा फेंका, किन्हीं को नीचे आधार बनाया, किन्हीं को मध्य में, किन्हीं को अन्त में दूर-दूर तक फेंका है एवं आप्त मनुष्यों को किन्हीं को जगत् से दूर मोक्ष में, किन्हीं को जीवन्मुक्त, किन्हीं को मुमुक्षुरूप में, किन्हीं को उपासक स्तुतिकर्ता के रूप में अपनाया है, जो प्राप्त करते हैं ॥८॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

रेतः कणों का शरीर में व्यापन

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (याः) = जो (आपः) = रेतः कणरूप जल (इन्द्रस्य) = उस शत्रुओं का विदारण करनेवाले प्रभु की (प्रसवे) = प्रेरणा में (सस्स्रुः) = शरीर के अन्दर ही गति करते हैं, (आसाम्) = इन रेतः कणों के (प्रथमाः) = सर्वप्रथम उत्पन्न होनेवाले कण (किल) = निश्चय से (दूरं जग्मुः) = शरीर में दूर-दूर पहुँचनेवाले होते हैं । रुधिर में व्याप्त होकर ये शरीर में सर्वत्र पहुँचते हैं । [२] (आसाम्) = इन रेतः कणों का (अग्रं क स्वित्) = भला अग्रभाग कहाँ है ? इनका (बुध्न:) = मूल क्व कहाँ है ? हे (आपः) = रेतः कणो ! (वः मध्यं क्व) = तुम्हारा मध्य कहाँ है ? सर्वत्र व्याप्त होने से इनका आदि, मध्य व मूल नहीं कहा जा सकता । बस इतना ही कह सकते हैं कि (नूनम्) = निश्चय से ये (अन्तः) = शरीर के अन्दर हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु की उपासना से रेतः कणों का शरीर में ही रक्षण होता है और वे शरीर में सर्वत्र व्याप्त होकर शरीर को नीरोग निर्मल व दीप्त बनाते हैं।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (आसाम्) आसामपां व्यापनशीलानां परमाणुधाराणां मध्ये यद्वाऽऽप्तमनुष्यप्रजानां मध्ये “मनुष्या वा आपश्चन्द्राः” [श० ७।३।१।२०] ‘आपः-आप्ताः प्रजाः” [यजु० ६।२७ दयानन्दः] (याः-आपः-इन्द्रस्य प्रसवे-सस्रुः) ये हीन्द्रस्य परमात्मनः प्रशासने प्रकृष्टैश्वर्यनिमित्तं स्रवन्ति प्रगच्छन्ति प्राप्तिं कुर्वन्ति वा (प्रथमाः-दूरं किल जग्मुः) प्रथमं प्रादुर्भूतो यद्वा प्रमुखा उत्तमास्तु-दूरस्थानं जगतो दूरं मोक्षं वा गच्छति (आपः) हे व्यापनशीलाः परमाणवः ! आप्तप्रजाः वा (आसां क्व स्वित्-अग्रम्) आसां युष्माकमग्रं क्व ह्यस्ति (क्व बुध्नः) कुत्र यूयमाधारो वा (क्व मध्यम्) मध्यं कुत्रास्ति (क्व नूनं वः-अन्तः) युष्माकं कुत्र सम्प्रति खल्वन्तः-इति जिज्ञासा ॥८॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - At the rise of the sun, the first rays and the first mists of the morning move and go far far away. Who knows what and where is their beginning, what is their basic foundation, what is their middle, and what and where their end? Who among you knows this mystery? (Only Indra).