पदार्थान्वयभाषाः - [१] (इन्द्रः) = वे परमैश्वर्यशाली प्रभु (किल) = निश्चय से (अस्य श्रुत्यै) = इसकी प्रार्थना को सुनने के लिए वेद - जानते हैं । अर्थात् 'प्रभु हमारी प्रार्थना को न सुनें' यह बात नहीं है । परन्तु मूर्खतावश की गई प्रार्थना को वह अनसुना कर देते हैं । उनको पूरा करके उन्हें हमारा विनाश थोड़े ही करना है ? (सः) = वे प्रभु (हि) = ही (जिष्णुः) = विजयशील हैं। हमें जो भी विजय प्राप्त होती है, वह प्रभु ही कराते हैं । सूर्याय पथिकृत् इन सूर्य आदि पिण्डों के लिए वे ही मार्ग को बनाते हैं। चराचर सभी को प्रभु ही नियम में चला रहे हैं । [२] (आत्) = सृष्टि को बनाने के बाद एकदम ही वे प्रभु (मेनाम्) = इस ज्ञान देनेवाली मननीय वेदवाणी को (कृण्वन्) = 'अग्नि, वायु, आदित्य व अंगिरा' आदि ऋषियों के हृदय में स्थापित करते हैं। (अच्युतः) = वे प्रभु किसी भी अधिक शक्तिशाली के द्वारा अपनी नियम व्यवस्था से च्युत नहीं किये जाते । वे प्रभु ही (गो:) = इस पृथिवी के तथा (दिवः) = द्युलोक के (पतिः) = स्वामी हैं। (सनजाः) = सदा से विद्यमान हैं । (अप्रतीत:) = किसी भी शत्रु से गन्तव्य नहीं है, अद्वितीय शक्तिशाली हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु ही हमारे लिए विजय को करते हैं। वे ही द्यावापृथिवी के स्वामी हैं । अनुपम शक्ति से चराचर का नियमन कर रहे हैं।