वांछित मन्त्र चुनें

इन्द्र॒: किल॒ श्रुत्या॑ अ॒स्य वे॑द॒ स हि जि॒ष्णुः प॑थि॒कृत्सूर्या॑य । आन्मेनां॑ कृ॒ण्वन्नच्यु॑तो॒ भुव॒द्गोः पति॑र्दि॒वः स॑न॒जा अप्र॑तीतः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

indraḥ kila śrutyā asya veda sa hi jiṣṇuḥ pathikṛt sūryāya | ān menāṁ kṛṇvann acyuto bhuvad goḥ patir divaḥ sanajā apratītaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

इन्द्रः॑ । किल॑ । श्रुत्यै॑ । अ॒स्य । वे॒द॒ । सः । हि । जि॒ष्णुः । प॒थि॒ऽकृत् । सूर्या॑य । आत् । मेना॑म् । कृ॒ण्वन् । अच्यु॑तः । भुव॑त् । गोः । पतिः॑ । दि॒वः । स॒न॒ऽजाः । अप्र॑तिऽइतः ॥ १०.१११.३

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:111» मन्त्र:3 | अष्टक:8» अध्याय:6» वर्ग:10» मन्त्र:3 | मण्डल:10» अनुवाक:9» मन्त्र:3


0 बार पढ़ा गया

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्रः किल) ऐश्वर्यवान् परमात्मा ही (अस्य) इस उपासक की (श्रुत्यै) श्रुति श्रवण के लिये (वेद) आन्तरिक कामना को जानता है (सः-हि) वह ही (जिष्णुः) जयशील सब पर अधिकार करनेवाला है (सूर्याय) सूर्य के लिये (पथिकृत्) मार्ग बनाता है (आत्) अनन्तर (मेनाम्) वेदवाणी को (कृण्वन्) प्रकट करता हुआ (अच्युतः) निश्चल (भुवत्) है (गोः) पृथिवी का (दिवः) द्युलोक का (पतिः) पालक या स्वामी (सनजाः) सनातन (अप्रतीतः) परिणामरहित अनन्त है ॥३॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा स्तुतिकर्त्ता उपासक की स्तुति सुनकर उसकी कामना पूर्ण करता है, आकाश के सूर्य जैसे महान् पिण्ड के लिये मार्ग बनाता है, वेदवाणी का प्रकाशक, पृथिवीलोक और सूर्यलोक का पालक स्वामी है ॥३॥
0 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

जिष्णु:-अच्युतः

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (इन्द्रः) = वे परमैश्वर्यशाली प्रभु (किल) = निश्चय से (अस्य श्रुत्यै) = इसकी प्रार्थना को सुनने के लिए वेद - जानते हैं । अर्थात् 'प्रभु हमारी प्रार्थना को न सुनें' यह बात नहीं है । परन्तु मूर्खतावश की गई प्रार्थना को वह अनसुना कर देते हैं । उनको पूरा करके उन्हें हमारा विनाश थोड़े ही करना है ? (सः) = वे प्रभु (हि) = ही (जिष्णुः) = विजयशील हैं। हमें जो भी विजय प्राप्त होती है, वह प्रभु ही कराते हैं । सूर्याय पथिकृत् इन सूर्य आदि पिण्डों के लिए वे ही मार्ग को बनाते हैं। चराचर सभी को प्रभु ही नियम में चला रहे हैं । [२] (आत्) = सृष्टि को बनाने के बाद एकदम ही वे प्रभु (मेनाम्) = इस ज्ञान देनेवाली मननीय वेदवाणी को (कृण्वन्) = 'अग्नि, वायु, आदित्य व अंगिरा' आदि ऋषियों के हृदय में स्थापित करते हैं। (अच्युतः) = वे प्रभु किसी भी अधिक शक्तिशाली के द्वारा अपनी नियम व्यवस्था से च्युत नहीं किये जाते । वे प्रभु ही (गो:) = इस पृथिवी के तथा (दिवः) = द्युलोक के (पतिः) = स्वामी हैं। (सनजाः) = सदा से विद्यमान हैं । (अप्रतीत:) = किसी भी शत्रु से गन्तव्य नहीं है, अद्वितीय शक्तिशाली हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु ही हमारे लिए विजय को करते हैं। वे ही द्यावापृथिवी के स्वामी हैं । अनुपम शक्ति से चराचर का नियमन कर रहे हैं।
0 बार पढ़ा गया

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्रः किल) ऐश्वर्यवान् परमात्मा हि (श्रुत्यै-अस्य वेद) श्रुत्यै श्रवणाय श्रुतिश्रवणायास्योपासकस्य कामनां जानाति (सः-हि जिष्णुः) स एव जयशीलः (सूर्याय पथिकृत्) सूर्याय मार्गनिर्माताऽस्ति “चकार सूर्याय पन्थामन्वेतवा उ” [ऋ० १।२४।८] (आत्) अनन्तरं (मेनां कृण्वन्) वेदवाचम् “मेना वाङ्नाम”-[निघo १।११] प्रकटीकुर्वन् (अच्युतः-भुवत्) अच्युतो निश्चलो भवति (गोः-दिवः-पतिः) पृथिव्यास्तथा द्युलोकस्य च पालकः (सनजाः-अप्रतीतः) सनातनोऽनन्तः ॥३॥
0 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indra knows the course of existence in entirety as is known by revelation of the Veda. He alone is the ultimate victorious over all, he alone sets the orbit for the sun, he alone reveals the sacred Word of divine knowledge. He alone is the master of heaven and earth, imperishable, eternal, infinite.