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य इ॒मे द्यावा॑पृथि॒वी जनि॑त्री रू॒पैरपिं॑श॒द्भुव॑नानि॒ विश्वा॑ । तम॒द्य हो॑तरिषि॒तो यजी॑यान्दे॒वं त्वष्टा॑रमि॒ह य॑क्षि वि॒द्वान् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ya ime dyāvāpṛthivī janitrī rūpair apiṁśad bhuvanāni viśvā | tam adya hotar iṣito yajīyān devaṁ tvaṣṭāram iha yakṣi vidvān ||

पद पाठ

यः । इ॒मे इति॑ । द्यावा॑पृथि॒वी इति॑ । जनि॑त्री॒ इति॑ । रू॒पैः । अपिं॑शत् । भुव॑नानि । विश्वा॑ । तम् । अ॒द्य । हो॒तः॒ । इ॒षि॒तः । यजी॑यान् । दे॒वम् । त्वष्टा॑रम् । इ॒ह । य॒क्षि॒ । वि॒द्वान् ॥ १०.११०.९

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:110» मन्त्र:9 | अष्टक:8» अध्याय:6» वर्ग:9» मन्त्र:4 | मण्डल:10» अनुवाक:9» मन्त्र:9


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (यः) जो परमात्मा (इमे जनित्री) इन वस्तुमात्र की उत्पन्न करनेवाली (द्यावापृथिवी) ऊपर-नीचे लोकभूमियों को-में (विश्वा भुवनानि) सब भूतों को (रूपैः) अपने-अपने रूपों से या भिन्न-भिन्न रूपों से पृथक्-पृथक् (अपिंशत्) करता है (होतः) हे होता ! तू (विद्वान्) जानता हुआ (इह-अध) इस अवसर पर अब (यजीयान्) अत्यन्त यज्ञ करता हुआ (इषितः) हमारे द्वारा प्रेरित (तं यष्टारं देवम्) उस सर्व के यज्ञ करनेवाले परमात्मदेव को (यक्षि) सङ्गत कर ॥९॥
भावार्थभाषाः - यज्ञ करनेवाला मनुष्य होमयज्ञ करता है, परन्तु होमयज्ञ करनेवाले तू गर्व न कर, ऊपर-नीचे के लोकों में अपने-अपने या भिन्न-भिन्न रूपों से सारी वस्तुओं का रचयिता है, यह महान् यज्ञ है, उस महान् यज्ञ करनेवाले को अपने आत्मा में सङ्गत करना चाहिये, आत्मयाजी बनना श्रेयस्कर है ॥९॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

त्वष्टा का उपासन

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यः) = जो [त्वष्टा] संसार का निर्माता दीप्तिमान् प्रभु [ त्वक्षतेर्वा निषतेर्वा] (इमे) = इन (विश्वा भुवनानि जनित्री) = सब लोकों को अपने में प्रादुर्भूत करनेवाली (द्यावापृथिवी) = द्यावापृथिवी को, द्युलोक व पृथिवीलोक को (रूपैः) = रूपों से (अपिंशत्) = अलंकृत करता है, सुन्दर बनाता है। हे ज्ञानिन् ! (तं देवं त्वष्टारम्) = उस देदीप्यमान निर्माता दीप्तिमान् प्रभु को (अद्य) = आज (इह) = इस जीवन में (यक्षि) = संगत कर, उसका पूजन करनेवाला बन । [२] हे (होतः) = उस प्रभु के प्रति अपना अर्पण करनेवाले जीव ! (इषितः) = उस प्रभु से प्रेरित हुआ तू (यजीयान्) = अधिक से अधिक प्राणियों से मेल करनेवाला, यज्ञशील व विद्वान् ज्ञानी बनेगा। वे प्रभु सब लोकों को सुरूप करते हैं, तेरे जीवन को भी उत्तम रूप से अलंकृत करेंगे। प्रभु की दीप्ति से तेरा जीवन भी दीप्त हो उठेगा।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम त्वष्टा के उपासक बनें। वे हमारे जीवन को दीप्त करनेवाले होंगे।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (यः-इमे जनित्री द्यावापृथिवी) यः परमात्मा खल्वेते, जनयित्र्यौ द्यावापृथिव्यौ-ऊर्ध्वाधो लोकभूमी (विश्वा भुवनानि) सर्वाणि भूतानि “भुवनानि भूतानि” [निरु० ८।१४] (रूपैः-अपिंशत्) स्वस्वरूपैर्यद्वा भिन्न-भिन्नरूपैः पृथक् पृथक् करोति “पिंश अवयवे” ‘अत्र सामर्थ्यात् करोत्यर्थे’ (होतः) हे होतस्त्वम् ! (विद्वान्) जानन् (इह-अध) अस्मिन्नवसरे सम्प्रति (यजीयान्) अतिशयेन यष्टा सन् (इषितः) अस्माभिः प्रेरितः (तं यष्टारं देवं यक्षि) तं रचयितारं परमात्मदेवं सङ्गमय ॥९॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - That shaping power of divinity which adorns with beautiful forms these two creative motherly heaven and earth and all other natural forms of existence, that divine refulgent Tvashta, O learned yajaka, loved and venerable, invoke, adore and worship in the yajna here today.