पदार्थान्वयभाषाः - [१] (बर्हिः) = वासनाशून्य हृदय वही है जो (प्रदिशा) = प्रकृष्ट दिशा से (प्राचीनम्) = आगे और आगे चल रहा है [प्राग् अञ्च्] । वेद में दिये गये प्रभु के आदेशों के अनुसार चलनेवाला हृदय ही 'बर्हिः' है । (अस्याः पृथिव्याः) = इस पार्थिव शरीर के (वस्त्रो:) = उत्तम निवास के लिए यह हृदय (अह्नाम् अग्रे) = बहुत सवेरे-सवेरे वृज्यते पापों से पृथक् किया जाता है। उषाकाल में प्रबुद्ध होकर प्रभु के आराधन से यह हृदय पवित्र बनाया जाता है। [२] यह (वरीयः) = उरुतर-विशाल हृदय (उ) = निश्चय से (वि तरम्) = खूब ही (वि प्रथते) = फैलता है, विशाल होता है। यह विशाल हृदय (देवेभ्यः) = सब दिव्यगुणों के लिए होता है, विशालता के साथ दिव्यगुण पनपते हैं। यह विशाल हृदय (अदितये) = स्वास्थ्य के लिए [अ+दिति, दौ अवखण्डने ] शरीर की शक्तियों के न खण्डित होने के लिए होता हुआ (स्योनम्) = सुखकर होता है। हृदय के विशाल होने पर शरीर भी स्वस्थ बना रहता है और इस प्रकार यह विशाल हृदय में दिव्यगुणों के विकास का कारण बनता है तो शरीर में यह स्वास्थ्य को देता है। इस प्रकार आधि-व्याधियों से ऊपर उठाकर यह हमें सुखी करता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - विशाल हृदयता दिव्यगुणों व स्वास्थ्य को विकसित करके हमें सुखी करती हैं ।