वांछित मन्त्र चुनें

प्रा॒चीनं॑ ब॒र्हिः प्र॒दिशा॑ पृथि॒व्या वस्तो॑र॒स्या वृ॑ज्यत॒र अग्रे॒ अह्ना॑म् । व्यु॑ प्रथते वित॒रं वरी॑यो दे॒वेभ्यो॒ अदि॑तये स्यो॒नम् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

prācīnam barhiḥ pradiśā pṛthivyā vastor asyā vṛjyate agre ahnām | vy u prathate vitaraṁ varīyo devebhyo aditaye syonam ||

पद पाठ

प्रा॒चीन॑म् । ब॒र्हिः । प्र॒ऽदिशा॑ । पृ॒थि॒व्याः । वस्तोः॑ । अ॒स्याः । वृ॒ज्य॒ते॒ । अग्रे॑ । अह्ना॑म् । वि । ऊँ॒ इति॑ । प्र॒थ॒ते॒ । वि॒ऽत॒रम् । वरी॑यः । दे॒वेभ्यः॑ । अदि॑तये । स्यो॒नम् ॥ १०.११०.४

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:110» मन्त्र:4 | अष्टक:8» अध्याय:6» वर्ग:8» मन्त्र:4 | मण्डल:10» अनुवाक:9» मन्त्र:4


0 बार पढ़ा गया

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (पृथिव्याः) वेदि के या प्रथित फैली हुई सृष्टि के (प्राचीनं बर्हिः) सामने प्रज्वलित अग्नि या पुरातन प्रवृद्ध ब्रह्म अग्नि (अस्याः-वस्तोः) इस वेदि के वास-प्रवर्तन के लिये या इस-सृष्टि के वास प्रवर्तन के लिये (प्रदिशा) विधि से या योग की प्रक्रिया से (अह्नाम्-अग्रे) दिनों के पूर्व (वृज्यते) अग्नि प्रकट किया जाता है या परमात्मा साक्षात्-किया जाता है, (वरीयः) अतिश्रेष्ठ (वितरम्) विस्तीर्ण (स्योनम्) सेवन करने योग्य हव्य या सुख (देवेभ्यः) वायु आदि देवों के लिये या जीवन्मुक्त आत्माओं के लिये (अदितये) पृथिवी के लिये या पृथिवीस्थ प्रजा के लिये (उ) अवश्य (वि प्रथते) विशिष्ट प्रवृद्ध होता है ॥४॥
भावार्थभाषाः - वेदि में अग्नि प्रज्वलित होकर हव्य पदार्थ को वायु आदि देवताओं में फैला देता है और पृथिवी पर भी हव्य का प्रभाव डालता है एवं परमात्मा विस्तृत सृष्टि के अन्दर व्यापक हुआ जीवन्मुक्तों व साधारण पृथिवीस्थ प्रजाओं के लिये सुख पहुँचाता है ॥४॥
0 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

विशाल - हृदय

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (बर्हिः) = वासनाशून्य हृदय वही है जो (प्रदिशा) = प्रकृष्ट दिशा से (प्राचीनम्) = आगे और आगे चल रहा है [प्राग् अञ्च्] । वेद में दिये गये प्रभु के आदेशों के अनुसार चलनेवाला हृदय ही 'बर्हिः' है । (अस्याः पृथिव्याः) = इस पार्थिव शरीर के (वस्त्रो:) = उत्तम निवास के लिए यह हृदय (अह्नाम् अग्रे) = बहुत सवेरे-सवेरे वृज्यते पापों से पृथक् किया जाता है। उषाकाल में प्रबुद्ध होकर प्रभु के आराधन से यह हृदय पवित्र बनाया जाता है। [२] यह (वरीयः) = उरुतर-विशाल हृदय (उ) = निश्चय से (वि तरम्) = खूब ही (वि प्रथते) = फैलता है, विशाल होता है। यह विशाल हृदय (देवेभ्यः) = सब दिव्यगुणों के लिए होता है, विशालता के साथ दिव्यगुण पनपते हैं। यह विशाल हृदय (अदितये) = स्वास्थ्य के लिए [अ+दिति, दौ अवखण्डने ] शरीर की शक्तियों के न खण्डित होने के लिए होता हुआ (स्योनम्) = सुखकर होता है। हृदय के विशाल होने पर शरीर भी स्वस्थ बना रहता है और इस प्रकार यह विशाल हृदय में दिव्यगुणों के विकास का कारण बनता है तो शरीर में यह स्वास्थ्य को देता है। इस प्रकार आधि-व्याधियों से ऊपर उठाकर यह हमें सुखी करता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - विशाल हृदयता दिव्यगुणों व स्वास्थ्य को विकसित करके हमें सुखी करती हैं ।
0 बार पढ़ा गया

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (पृथिव्याः) वेद्याः “पृथिवी वेदिः” [ऐ० ५।८] प्रथितायाः सृष्टेर्वा (प्राचीनं बर्हिः) प्राक्स्थानं ज्योतिरग्निः “बर्हिः परिबर्हणात्” [निरु० ८।८] प्राक्तनं परिवृढं ब्रह्म ज्योतिर्वा (अस्याः-वस्तोः-) अस्या वेद्याः-वासाय प्रवर्तनाय, अस्याः सृष्टेः-वासाय प्रवर्तनाय वा (प्रदिशा-अह्नाम्-अग्रे वृज्यते) विधिना दिवसानामग्रे पूर्वं प्रकटीक्रियते, योगप्रकारेण साक्षात्क्रियते, (वरीयः वितरं स्योनम्) अतिश्रेष्ठं विस्तीर्णं सेवितव्यं हव्यसुखं वा (देवेभ्यः-अदितये-उ वि प्रथते) वायुप्रभृतिभ्यः पृथिव्यै-अवश्यं-विशिष्टं प्रवर्धते यद्वा जीवन्मुक्तेभ्यः पृथिवीस्थप्रजायै-अवश्यं विशिष्टं-प्रवर्धते ॥४॥
0 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - In advance of the days and dawns for the vestment of this earth as ever, holy grass is gathered and spread out over the vedi by divine ordainment, and the creative yajna proceeds and expands wide and high, joyous and brilliant for mother earth and the divinities.$(This yajna may be interpreted either as the daily morning yajna or the first creative yajna at the dawn of each existential cycle.)