यज्ञमय जीवन-यज्ञशेष का सेवन
पदार्थान्वयभाषाः - [१] आचार्यकुल से जिस दिन समावृत्त होकर विद्यार्थी पुनः घर आता है उस दिन यह उसका द्वितीय जन्म कहलाता है । (जात:) = आचार्य गर्भ से आज द्वितीय जन्म को प्राप्त करनेवाला यह समावृत्त हुआ हुआ युवक (सद्यः) = शीघ्र ही यज्ञं व्यमिमीत गृहस्थ यज्ञ को निर्मित करता है, गृहस्थ बनकर पञ्च महायज्ञों का करनेवाला होता है। (अग्निः) = यह प्रगतिशील होता है। आगे और आगे बढ़ता हुआ (देवानाम्) = देवों का (पुरोगाः) = अग्रगामी (अभवत्) = होता है । [२] ये (देवा:) = देववृत्तिवाले गृहस्थ पुरुष अस्य होतुः इस सब पदार्थों के देनेवाले प्रभु की (प्रदिशि) = प्रकृष्ट प्रेरणा में, (ऋतस्य वाचि) = सत्यज्ञान की वाणी में, अर्थात् वेद के कथनानुसार (स्वाहाकृतम्) = यज्ञों में आहुत की गई (हविः) = हवि को (अदन्तु) = खाएँ । अर्थात् यज्ञ करके यज्ञावशिष्ट भोजन को ही करनेवाले हों। यह यज्ञशेष ही तो इन्हें अमर बनाएगा, रोगी न होने देगा। प्रभु ने वेद में जिन पदार्थों के ग्रहण करने का निर्देश किया है, हम उन्हीं पदार्थों को ग्रहण करनेवाले हों।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हमारा गृहस्थ जीवन यज्ञमय हो । यज्ञशेष का ही सेवन करनेवाले हम अमरता [नीरोगता] का लाभ प्राप्त करें । सूक्त की मूल भावना यही है कि हम प्रभु का उपासन करें, यज्ञमय जीवन बिताएँ, यज्ञशेष का सेवन करते हुए अमर [नीरोग] बनें। ऐसा होने पर ही यह सम्भव है कि हम 'पञ्चभूत तथा मन, बुद्धि व अहंकार' इन आठों को दीप्त व निर्मल करके 'अष्टादंष्ट्र' = बने [ दंश् to shine]। ऐसा बनेंगे तो हम निश्चय से अत्यन्त विशिष्ट रूपवाले 'वैरूप' होंगे। अगला सूक्त इस ऋषि 'अष्टादंष्ट्र वैरूप' का ही है-