पदार्थान्वयभाषाः - [१] (ब्रह्मचारी) = ज्ञान में विचरण करनेवाला, ब्रह्मचर्याश्रम का पालन करनेवाला, (विषः) = व्यापक विज्ञानों को [विष व्याप्तौ ] (वेविषत्)= व्याप्त करता हुआ चरति गति करता है। इस आश्रम में वह अधिक-से-अधिक ज्ञान प्राप्त करने का प्रयत्न करता है। इस ज्ञान प्राप्ति के लिए ही (सः) = वह (देवानाम्) = देवों का (एकं अंगम्) = एक अंग भवति हो जाता है। देव अंगी हैं, तो यह उनका अंग होता है। उनके प्रति अपने को गौण कर देता है, उनके कहने के अनुसार चलता है । 'मातृदेवो भव, पितृ देवो भव, आचार्य देवो भव' = माता, पिता व आचार्य उसके देव होते हैं। उनके आज्ञापालन में चलता हुआ यह उत्कृष्ट ज्ञानी बनता है । [२] (तेन) = उस देवताओं के अंग बनने से यह (जायाम्) = ब्रह्मजाया को, वेदवाणी को (अन्वविन्दत्) = प्राप्त करता है। वेदवाणी को प्राप्त करने के कारण ही यह 'बृहस्पतिः' [बृहत्याः पतिः ] = बृहती वेदवाणी का पति बनता है। [३] यह उस ब्रह्मजाया को प्राप्त करता है, जो (सोमेन नीताम्) = [स+ उमा - ब्रह्मविद्या] ब्रह्मविद्या से युक्त सौम्य स्वभाववाले आचार्य से प्राप्त करायी गयी है। उस प्रकार प्राप्त करायी गई है, (न) = जैसे (देवा:) = देव (जुह्वम्) = जुहू, अर्थात् यज्ञ - चमस को प्राप्त कराते हैं। देव यज्ञों की प्रेरणा को देते हुए जैसे हाथों में चम्मच का ग्रहण करते हैं, अर्थात् कर्मेन्द्रियों से यज्ञादि उत्तम कर्मों को कराते हैं, उसी प्रकार सोम ब्रह्मजाया को प्राप्त कराके ज्ञानेन्द्रियों को ज्ञान- प्रवण करते हैं । [४] प्रस्तुत मन्त्र में प्रसंगवश ब्रह्मचर्याश्रम व गृहस्थाश्रम का सुन्दर संकेत हुआ है । ब्रह्मचारी माता आदि देवों की अधीनता में चलता हुआ ऊँचे से ऊँचा ज्ञान प्राप्त करता है। ज्ञान प्राप्त करके बृहस्पति बनकर यह गृहस्थ बनता है और वेद के स्वाध्याय को न छोड़ता हुआ यज्ञशील बनता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम ब्रह्मचर्याश्रम में खूब ज्ञान प्राप्त करें और गृहस्थ में यज्ञशील हों ।