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ए॒वा च॒ त्वं स॑रम आज॒गन्थ॒ प्रबा॑धिता॒ सह॑सा॒ दैव्ये॑न । स्वसा॑रं त्वा कृणवै॒ मा पुन॑र्गा॒ अप॑ ते॒ गवां॑ सुभगे भजाम ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

evā ca tvaṁ sarama ājagantha prabādhitā sahasā daivyena | svasāraṁ tvā kṛṇavai mā punar gā apa te gavāṁ subhage bhajāma ||

पद पाठ

ए॒व । च॒ । त्वम् । स॒र॒मे॒ । आ॒ऽज॒गन्थ॑ । प्रऽबा॑धिता । सह॑सा । दैव्ये॑न । स्वसा॑रम् । त्वा॒ । कृ॒ण॒वै॒ । मा । पुनः॑ । गाः॒ । अप॑ । ते॒ । गवा॑म् । सु॒ऽभ॒गे॒ । भ॒जा॒म॒ ॥ १०.१०८.९

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:108» मन्त्र:9 | अष्टक:8» अध्याय:6» वर्ग:6» मन्त्र:4 | मण्डल:10» अनुवाक:9» मन्त्र:9


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सरमे) हे सरणशील स्तनयित्नु-वाक् ! (एव च) ऐसे (त्वम्) तू (दैव्येन सहसा) देवसम्बन्धी या देवों में होनेवाले बल से (प्रबाधिता) प्रबाधित हुई प्रेरित हुई (आ जगन्थ) आई है, (त्वं स्वसारम्) तुझे बहिन (कृणवै) करें-बनावें हम (मा पुनः अपगाः) मत फिर देवों में लौट (सुभगे) हे सौभाग्यवती ! (ते) तेरे लिये (गवां भजाम) जलों का भाग देते हैं ॥९॥आध्यात्मिकयोजना−अच्छा तो ! देह से अन्य देह को प्राप्त होनेवाली चेतना ! परमात्मदेव के बल से प्रेरित शरीर में आई तुझे हम इन्द्रिय प्राण भगिनी-बहिन या स्वकीय चेतनत्व को सारयित्री प्रसारयित्री मानते हैं, शरीर से पुनः न जा, हे सुधनवती ! विषयप्रवृत्तियों का यथेष्ट भाग तेरे विभक्त करेंगे-देंगे ॥९॥
भावार्थभाषाः - स्वार्थी लोग अनुचित धन पर अधिकार करनेवाले मध्य में किसी समझानेवाले को भी फुसलाया करते हैं, तू भी इसमें से भाग ले ले और हमारे पक्ष में रह ॥९॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

बुद्धि का दूर न चले जाना

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (सरमे) = बुद्धि ! (त्वम्) = तू (एवा) = इस प्रकार (दैव्येन सहसा) = देव के, प्रभु के सहस् से [giolence] प्रबल पीड़ा से (प्रबाधिता) = पीड़ित हुई हुई (आजगन्थ च) = आई ही है । जब कभी जीवन में कोई प्रबल धक्का लगता है, तो उस समय बुद्धि विषयों से पराङ्मुख होकर प्रभु की ओर लौटने की करती है । [२] जो लोग आजतक सांसारिक व्यवहारों के अन्दर ही उलझे हुए थे, अब वे पणि भी कुछ आत्म-प्रवण होते हैं । वे बुद्धि से कहते हैं कि (त्वा) = तुझे (स्वसारम्) = [स्वं सारयति] आत्मतत्त्व की ओर ले चलनेवाला (कृणवै) = करते हैं । अब (पुनः) = फिर (मा गा:) = हमारे से दूर जानेवाली न हो। तू हमारे में स्थिर बनी रहे । हे (सुभगे) = ज्ञानरूप ऐश्वर्यवाली बुद्धि ! अब (अप) = इन इन्द्रियों को अविद्याजनित विषय-वासनाओं से दूर करके (ते) = तेरे साथ (गवाम्) = इन इन्द्रियों का (भजाम) = सेवन करते हैं । अर्थात् सांसारिक विषयों में न फँसकर ज्ञानेन्द्रियों से ज्ञानार्जन को और कर्मेन्द्रियों से यज्ञादि कर्मों को हम करनेवाले बनते हैं । हमारी इन्द्रियों से होनेवाली सब क्रियाएँ बुद्धिपूर्वक होती हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हमारे से बुद्धि दूर न चली जाये। हमारी सब क्रियाएं बुद्धिपूर्वक हों। यह बुद्धि हमें आत्मतत्त्व की ओर ले चलनेवाली हो ।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सरमे) हे सरणशीले स्तनयित्नु वाक् ! (एव च) एवं तर्हि (त्वं दैव्येन सहसा) त्वं देवसम्बन्धिना देवेषु भवेन वा बलेन (प्रबाधिता-आजगन्थ) प्रेरिताऽथागता (त्वां स्वसारं कृणवै) त्वां निजभगिनीं कुर्मः “छान्दसमेकवचनम्” (मा पुनः-अपगाः) तत्र देवेषु पुनर्माऽपगच्छ (सुभगे) हे सौभाग्यवति ! (ते गवां भजाम) तुभ्यं जलानां यथायोग्यं यथेच्छं वा भागं विभजाम विभक्तं (दद्मः) ॥९॥ आध्यात्मिकयोजना−एवं तर्हि देहाद् देहान्तरगन्ति चेतने ! परमात्मदेवभवेन परमात्मबलेन वा प्रेरिता शरीरे त्वां प्राप्ता वयमिन्द्रियप्राणाः भगिनी यद्वा स्वकीयं चेतनत्वं सारयित्रीं मन्यामहे शरीरात् पुनर्न गच्छ, सुधनवति ! विषयप्रवृत्तीनां यथेच्छभागं तुभ्यं विभक्तं करिष्यामो दास्यामः ॥९॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Panis: O Sarama, thunderous voice and lightning version of Indra, this way, then, you come equipped with divine powers and forces. We then accept you as our self-fluent and self-energised sister. O glorious sister, pray do not go back, we share the waves and vapours of life with you, and we give you what is yours.