पदार्थान्वयभाषाः - [१] सरमा पणियों को उत्तर देती हुई कहती है कि (इह) = इस आन्तर ज्ञान निधि के रक्षण के मार्ग पर (ऋषयः) = तत्त्वद्रष्टा लोग (आगमन्) = गति करते हैं। वे तत्त्वद्रष्टा जो (सोमशिताः) = सोम के द्वारा तीव्र किये गये हैं। सोम, अर्थात् वीर्य के रक्षण से जिनकी बुद्धि तीव्र बनी है। (अयास्यः) = जो अनथक है, [अ+यस्], (अंगिरसः) = अंग-प्रत्यंग में रसवाला है और (नवग्वाः) = स्तुत्य गतिवाले हैं [नु स्तुतौ]। ये लोग आन्तर निधि के रक्षण के मार्ग पर प्रवृत्त होते हैं । [२] (ते) = वे (एतम्) = इस (गोनां ऊर्वम्) = इन्द्रियरूप गौवें के समूह को (विभजन्त) = अविद्या पर्वत की गुहा से विभक्त [=पृथक्] करते हैं । सो (पणयः) = व्यवहारी लोगो ! अथ अब तुम (एतद् वचः) = इस वचन को कि रेकु पदमलकमाजगन्थ' 'हे बुद्धि ! तू भी व्यर्थ ही इस शंकास्पद स्थान को आयी है ' (इत्) = निश्चय से (वमन्) = उद्गीर्ण ही कर दें। अर्थात् भय की कोई बात नहीं। 'ऋषि, सोमशित्, अयास्य, अंगिरस् व-नवग्व' वासनाओं को जीतकर आन्तर निधि का रक्षण करते हैं। वासनारूप शत्रु प्रबल हैं, परन्तु बुद्धि को प्रधानता देनेवाले व्यक्ति इनको जीतकर आन्तर धन का रक्षण करते हैं, अपनी ज्ञानेन्द्रियों, कर्मेन्द्रियों व प्राणों को ठीक रखने का प्रयत्न करते हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- इन्द्रियरूप गौवों का रक्षण 'ऋषि, सोमशित्, अयास्य, अंगिरस् व नवग्व' करते हैं ।