विषयों से युद्ध करके इन्द्रयरूप गौवों को मुक्त करना
पदार्थान्वयभाषाः - [१] पणि सरमा से कहते हैं कि - हे (सुभगे) = उत्तम ज्ञानैश्वर्यवाली (सरमे) = सरणशील बुद्धि, (दिवः अन्तान्) = ज्ञान के अन्त भागों को (परिपतन्ती) = सब ओर से प्राप्त करती हुई, ज्ञान की चरमसीमा पर पहुँचने की इच्छा करती हुई, (या: ऐच्छ:) = जिनको तूने चाहा है वे (गावः इमाः) = इन्द्रियाँ ये हैं । इन इन्द्रियों के द्वारा ही मनुष्य अपने ज्ञान को बढ़ाता हुआ एक दिन ज्ञान के शिखर पर जा पहुँचता है। परन्तु यदि ये इन्द्रियाँ पणियों से चुरी ली जाएँ, अर्थात् यदि सारे समय सांसारिक व्यवहारों में ही पड़ी रहें और सांसारिक सम्पत्ति व भोगों का परिग्रह ही इनका उद्देश्य बन जाए तो फिर ज्ञान समाप्त हो जाता है। [२] पणि कहते हैं कि (ते एनाः) = तेरी इन इन्द्रियरूप गौवों को (कः) = कौन (अयुध्वी) = वासनाओं से युद्ध न करनेवाला पुरुष (अवसृजात्) = सांसारिक विषयों के बन्धन से छुड़ा सकता है। ये इन्द्रियाँ वस्तुतः बुद्धि की होनी चाहिएँ, परन्तु जब एक मनुष्य सांसारिक विषय वासनाओं से युद्ध नहीं करता तो ये इन्द्रियाँ विषयों में फँस जाती हैं। [३] और यह भी बात है कि 'यह युद्ध कोई आसानी से जीता जा सके ऐसी बात नहीं है । पणि कहते हैं कि (उत) = और (अस्माकम्) = हमारे अर्थात् हमारे पर पड़नेवाले भाषा में हम इस प्रकार का प्रयोग देखते हैं कि 'मेरा रोग बड़ा भयङ्कर है' इस वाक्य में मेरा का भाव है 'मेरे पर जिसका आक्रमण हुआ है' वह रोग बड़ा भयङ्कर है। इसी प्रकार यहाँ (अस्माकम्) = हमारे अर्थात् हमारे पर पड़नेवाले (आयुधा) = आयुध (तिग्मा सन्ति) = बड़े तेज हैं। कामदेव के धनुष व बाण फूलों के बेशक बने हैं, पर उनके आक्रमण से बचने का सम्भव किसी विरल व्यक्ति के लिए ही होता है। जो युद्ध में इनको जीत पाता है वही इन्द्रियरूप गौवों को 'पञ्चपर्वा अविद्यारूप पर्वत' की गुहा से मुक्त कर पाता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - ज्ञान प्राप्त करना है तो आवश्यक है कि इन्द्रियरूप गौवों को अविद्यापर्वत की गुहा से मुक्त करें। इसके लिए विषय वासनाओं से युद्ध करके उन्हें पराजित करना होगा ।