वांछित मन्त्र चुनें

की॒दृङ्ङिन्द्र॑: सरमे॒ का दृ॑शी॒का यस्ये॒दं दू॒तीरस॑रः परा॒कात् । आ च॒ गच्छा॑न्मि॒त्रमे॑ना दधा॒माथा॒ गवां॒ गोप॑तिर्नो भवाति ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

kīdṛṅṅ indraḥ sarame kā dṛśīkā yasyedaṁ dūtīr asaraḥ parākāt | ā ca gacchān mitram enā dadhāmāthā gavāṁ gopatir no bhavāti ||

पद पाठ

की॒दृक् । इन्द्रः॑ । स॒र॒मे॒ । का । दृ॒शी॒का । यस्य॑ । इ॒दम् । दू॒तीः । अस॑रः । प॒रा॒कात् । आ । च॒ । गच्छा॑त् । मि॒त्रम् । ए॒न॒ । द॒धा॒म॒ । अथ॑ । गवा॑म् । गोऽप॑तिः । नः॒ । भ॒वा॒ति॒ ॥ १०.१०८.३

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:108» मन्त्र:3 | अष्टक:8» अध्याय:6» वर्ग:5» मन्त्र:3 | मण्डल:10» अनुवाक:9» मन्त्र:3


0 बार पढ़ा गया

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सरमे) हे माध्यमिका वाक् स्तनयित्नु गर्जना ! (इन्द्रः कीदृङ्) वह इन्द्र कैसा है (का दृशीका) उसकी दृष्टि शक्ति कैसी है (यस्य दूती) जिसकी दूती बनी तू (पराकात्) दूर स्थान से (इदम् असरः) इस स्थान पर प्राप्त हुई (आगच्छात्) आ जावे वह इन्द्र (च) और (एन मित्रं दधाम) इसे मित्र धारण करावें-बनावें हम (अथ) और (नः-गवां पतिः-भवाति) हमारे अधीन गौओं-रश्मियों जलों स्वामी हो जावे-बने ॥३॥ आध्यात्मिकयोजना−हे शरीर में सरणशील चेतना ! वह इन्द्र कैसा है, उसकी कैसी दृष्टिशक्ति है, जिसकी दूती तू दूर से इस स्थान पर प्राप्त हुई है, वह देव इन्द्र आजावे, इसे मित्ररूप में धारण करें-बनावें और वह इन्द्रियवृत्तियों का रक्षक होवे ॥३॥
भावार्थभाषाः - शक्तिशाली विद्युत् की प्रेरित गर्जना है, विद्युत् को शक्तशाली सिद्ध करती है, जो मेघों में गृहरश्मियों जलों को बाहिर कर सकता है ॥३॥
0 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

प्रभु रूप मित्र का धारण

पदार्थान्वयभाषाः - [१] व्यवहारी पुरुष बुद्धि से प्रश्न करते हैं कि हे (सरमे) = सरणशील बुद्धि ! वह (इन्द्रः) = परमैश्वर्यवाला प्रभु (कीदृड्) = कैसा है ! (का दृशीका) = कैसा उसका स्वरूप है, वह कैसा दिखता है ? अथवा उसकी दृष्टि कैसी है ? हमारे लिए उसका दृष्टिकोण क्या है ? उस परमात्मा का, (यस्य) = जिसकी (दूती:) = सन्देशवाहिका बनी हुई तू (पराकात्) = सुदूर देश से (इदम्) = इस हमारे स्थान को (असरः) = प्राप्त हुई है । [२] (च) = और यदि वह इन्द्र (आगच्छात्) = हमें प्राप्त हो तो (एना मित्रं दधाम) = इस प्रभु को मित्र रूप से हम धारण करें। (अथा) = प्रभु को धारण करने पर वह (नः गवाम्) = हमारी इन्द्रियों को (गोपतिः) = उत्तम स्वामी व रक्षक (भवाति) = होता है । वस्तुतः बुद्धि का सबसे बड़ा उपयोग यही है कि वह हमें प्रभु को प्राप्त कराती है। ये प्रभु हमारी इन्द्रियों के स्वामी बनते हैं और हम इन्द्रियों को विषयों को शिकार होते हुए नहीं देखते।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - बुद्धि के सम्पर्क में हमारे में यह प्रश्न उठता है कि वे प्रभु कैसे हैं ? हमें प्रतीत होता है कि वे प्रभु हमें प्राप्त हों, तो वे मित्रभूत प्रभु हमारी इन्द्रियों के रक्षक होंगे ।
0 बार पढ़ा गया

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सरमे) हे माध्यमिके स्तनयित्नु वाक् ! (इन्द्रः-कीदृङ्) स इन्द्रः कीदृशोऽस्ति (का दृशीका) तस्य दर्शनशक्तिः का कथम्भूता च (यस्य दूतीः) यस्य दूती सती त्वं (पराकात्-इदम्-असरः) दूरात् खल्विदं स्थानं सरसि-प्राप्ता भवसि (आगच्छात्) स आगच्छतु (च) तथा (एन मित्रं दधाम) एतं स्वकीयं मित्रं धारयाम (अथ) अथ च (गवां पतिः-नः भवाति) अस्माकमधीने रक्षितानां गवां रश्मीनां जलानां वा पतिर्भवतु ॥३॥ आध्यात्मिकयोजना−सरमे शरीरे सरणशीले चेतने स इन्द्रः कीदृशस्तस्य कथञ्जातीया दृष्टिशक्तिरस्ति यस्य दूती सती दूरादिदं स्थानं प्राप्तवती, स देव इन्द्र आगच्छतु खल्वेनं मित्रं धारयामोऽथ स गवामिन्द्रियवृत्तीनां रक्षिता भवेत् ॥३॥
0 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Panis: O Sarama, voice of thunder and lightning, O dynamic spirit of life, what sort is this Indra? What is his strength and splendour whose messenger you come travelling from far, whom we should receive as a friend and bear as one that he may be our master and the master of our cows, our powers and potentials for living?