पदार्थान्वयभाषाः - [१] (घर्मा इव) = शक्ति के पुञ्ज बने हुए [घर्म-शक्ति की उष्णता] ये पति-पत्नी (जठरे) = अपने उदरों में (मधु सनेरू) = माधुर्ययुक्त हृदय सात्त्विक भोजनों का ही सेवन करनेवाले होते हैं । (भगे अविता) = ऐश्वर्य में स्थित हुए हुए अपना रक्षण करनेवाले होते हैं । (अरं तुर्फरी) = [अरं अलम्] खूब ही शत्रुओं का हिंसन करनेवाले होते हैं। (फारिवा) = [फारि: आयुधम्, स्फुर to kill ] उत्तम आयुधोंवाले हैं, अपनी इन्द्रियों, मन व बुद्धि को उत्तम बनाते हैं । [२] ये पति-पत्नी (पतरा इव) = पतनशील पक्षियों की तरह (चचरा) = संचरणशील हैं, इनका जीवन खूब क्रियाशील होता है। (चन्द्रनिर्णिड्) = [निर्णिक् = रूपम्] आह्लादक रूपवाले हैं, सदा प्रसन्न मुख होते हैं। मन (ऋंगा) = मन के द्वारा अपना प्रसाधन करनेवाले होते हैं, अर्थात् विचारपूर्वक कार्यों को करते हुए ये अपने जीवन को सगुणों से सुशोभित करते हैं (मनन्या न जग्मी) = जैसे ये मनन में, विचारशीलता में उत्तम होते हैं, उसी प्रकार यज्ञादि उत्तम कर्मों के प्रति जानेवाले होते हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- पति-पत्नी को चाहिए कि शुद्ध सात्त्विक भोजन करें। विचारशील व क्रियाशील हों । सदा प्रसन्नमुख हों ।