पदार्थान्वयभाषाः - [१] (उग्रा) = तेजस्वी पति-पत्नी (पज्रा इव) = [ प्रार्जित बलौ सा० ] खूब सञ्चित बलवाले वीरों के समान [पादाभ्यां अभिभवन्तौ] पाँवों से शत्रुओं को कुचलते हुए, (चर्चरम्) = इस ढीले जोड़ोंवाले अतएव चरचर करते हुए (जारं) = जीर्ण (मरायु) = मरणयुक्त शरीर को (अर्थेषु) = गन्तव्य विषयों के निमित्त (क्षद्म इव) = उदक की तरह (तर्तरीथः) = [तारयथः] तरानेवाले होते हो। जैसे नाव द्वारा पानी को तैरकर मनुष्य प्राप्तव्य परले तट पर पहुँचता है इसी प्रकार ये (पज्र) = शक्ति-सम्पन्न पति-पत्नी इस शरीर को नाव बनाकर संसार सागर को तैरते हैं और धर्मार्थ काम मोक्षरूप अर्थों को सिद्ध करते हैं । [२] (ऋभू न) = जैसे ऋभुओं को, (देव) = शिल्पियों को स्वनिर्मित रथ प्राप्त होता है उसी प्रकार ऋत से देदीप्यमान इन पति-पत्नी को, जो (खरमज्रा) = [खटं मञ्जयितारौ ] अत्यन्त शुद्ध हृदयवाले हैं इन पति-पत्नी को वह शरीर रथ (आपत्) = प्राप्त होता है जो (खरज्रुः) - तीक्ष्ण गति, अतिशयेन वेगवान् है, (वायु न) = यह रथ वायु के समान (पर्फरत्) = शक्तियों का अपने में पूरण करनेवाला है और (रयीणाम्) = सब ऐश्वर्यों का क्षयत् निवास होता है [क्षि-निवासे] ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ-शक्ति का संचय करनेवाले पति-पत्नी इस शरीर को नाव के समान बनाकर भवसागर को तैरते हैं और सब पुरुषार्थों को सिद्ध करते हैं। अपने को शुद्ध करनेवाले ये पति- पत्नी इस शरीर - रथ को शक्तियों से पूर्ण करते हैं और ऐश्वर्यों को निवास स्थान बनाते हैं ।