पदार्थान्वयभाषाः - [१] आदर्श पति-पत्नी का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि-(वंसगा इव) = वननीय, सुन्दर गतिवाले वृषभों की तरह (पूषर्या) = पुष्ट अवयवोंवाले, स्फीत अंग-प्रत्यंगोंवाले। (शिम्बाता) = [शिम्बेन दुःखानां तनूकरणेन हेतुना अततः] इनकी सब क्रियाएँ लोगों के दुःखों के दूर करने के हेतु से होती हैं। मित्रा (इव) = मित्रों की तरह (ऋता) = ऋतपूर्वक व्यवहारवाले (शतरा) = [शत+रा] शतशः धनों का दान करनेवाले, (शातपन्ता) = [शात निशित, तीक्ष्णस्तुतिको] प्रभु की खूब स्तुति करनेवाले । [२] (वाजा इव) = शक्ति के पुञ्ज घोड़ों के समान (वयसा उच्चा) = आयुष्य के दृष्टिकोण से उत्कृष्ट, अर्थात् उचित पुष्टि को प्राप्त। (घर्म्येष्ठा) = तप में स्थित अथवा [घर्मं दीप्तमन्तरिक्षं] दीप्त हृदयान्तरिक्ष में स्थित, दीप्त हृदयवाले। (मेषा इव) = दो मेढ़ों के समान पुष्ट व गतिशील, (इषा सपर्या) = अन्न से परिचर्या करनेवाले, अर्थात् अन्न का यज्ञों में विनियोग करनेवाले और यज्ञशेष से (पुरीषा) = अपना पालन व पूरण करनेवाले ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- पति-पत्नी दृढ़ शरीरवाले, परदुःखहरण की क्रियाओंवाले, स्तुति की प्रवृत्तिवाले व यज्ञशेष से शरीर को पुष्ट करनेवाले हों ।