पदार्थान्वयभाषाः - [१] (शकुनस्य पक्षा इव) = पक्षी के दोनों पंखों की तरह आप (साकं युजा) = साथ-साथ मिलकर होनेवाले हो । पक्षी के दाएँ और बाएँ पंख अलग-अलग होते हुए भी मिलकर कार्य करते हैं। इसी प्रकार पति-पत्नी अलग-अलग होते हुए भी मिलकर गृहस्थ में उन्नत होते हैं। एक पंख से आकाश में उड़ने का सम्भव नहीं, इसी प्रकार अकेले के लिए गृहस्थ को उन्नत करने का सम्भव नहीं । [२] (चित्रा पश्वा इव) = चायनीय, ज्ञानयुक्त प्राणियों की तरह (यजुः) = यज्ञ को (आगमिष्टम्) = प्राप्त होवो। जैसे दो पशु मिलकर गाड़ी को खैंचते हुए गन्तव्य देश के प्रति जाते हैं इसी प्रकार पति-पत्नी ज्ञानयुक्त पशुओं की तरह होते हुए यज्ञादि कर्मों के प्रति आनेवाले हों। [३] (देवयोः) = दिव्यगुणों को अपनाने की इच्छावाले यजमान की (अग्निः इव) = अग्नि के समान (दीदिवांसा) = ये पति-पत्नी चमकनेवाले हों। जैसे अग्नि चमकती है, इस प्रकार पति-पत्नी भी तेजस्वी हों। इसके लिए 'देवयोः' शब्द सुन्दर संकेत कर रहा है कि वे दिव्य गुणों को अपनाने की कामनावाले बनें। [४] (परिज्माना इव) = [परित: अजतः] सब कर्त्तव्य कर्मों की ओर जानेवाले ये पति-पत्नी (पुरुत्रा यजथः) = शतशः स्थानों में मिलकर यज्ञात्मक कर्मों को करनेवाले होते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- पति-पत्नी मिलकर यज्ञात्मक कार्यों को करते हुए तेजस्विता को प्राप्त करें ।