पदार्थान्वयभाषाः - [१] (स्तोमं ऋध्याम) = हम सब स्तोम का वर्धन करें। खूब स्तुति करनेवाले हों । और इस स्तुति के द्वारा (वाजम्) = शक्ति को सनुयाम प्राप्त करें। [२] इस प्रकार प्रार्थना करनेवाले पति-पत्नी से प्रभु कहते हैं कि तुम (इह) = इस जीवन में (सरथा) = समान रथवाले होकर, परस्पर अभिन्न होकर (नः मंत्रम्) = हमारे से दिये गये इस (वेद) = ज्ञान को (उपयातम्) = समीपता से प्राप्त होवो। (न) [न इति चार्थे] = और (गोषु अन्तः पक्वम्) = गौवों के अन्दर उनके ऊधस् में ही परिपक्व (यक्षः) = [food] भोजन को, दुग्धरूप पूर्ण भोजन को (आ) [ गच्छतम् ] = प्राप्त होवो । [३] (भूतांशः) = इस उत्पन्न जगत् को जीवों के लिए विभक्त करनेवाला [भूत+अंश] वह प्रभु (अश्विनौ) = कर्मों में व्याप्त होनेवाले इन पति-पत्नी के (कामम्) = अभिलाषा का (अप्राः) = पूरण करता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - हम स्तुतिमय जीवनवाले होकर शक्ति का संवर्धन करें। मधुर गोदुग्ध का सेवन करनेवाले बनें। सूक्त के प्रारम्भ में पति-पत्नी को 'सध्रीचीना'=सदा मिलकर चलनेवाला कहा है । [१] समाप्ति पर भी 'सरथा'=समान रथवाला बनने का उपदेश दिया है। ऐसे पति-पत्नी 'भूतांश' प्राप्त धन को बाँटनेवाले हैं। इस संविभाग से ये दिव्य वृत्तिवाले व शक्तिशाली शरीरोंवाले 'दिव्य आंगिरस' बनते हैं। ये ही अगले सूक्त के ऋषि हैं। 'दक्षिणा' ही देवता, अर्थात् सूक्त का विषय है-