अव॑ नो वृजि॒ना शि॑शीह्यृ॒चा व॑नेमा॒नृच॑: । नाब्र॑ह्मा य॒ज्ञ ऋध॒ग्जोष॑ति॒ त्वे ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
ava no vṛjinā śiśīhy ṛcā vanemānṛcaḥ | nābrahmā yajña ṛdhag joṣati tve ||
पद पाठ
अव॑ । नः॒ । वृ॒जि॒ना । शि॒शी॒हि॒ । ऋ॒चा । व॒ने॒म॒ । अ॒नृचः॑ । न । अब्र॑ह्मा । य॒ज्ञः । ऋध॑क् । जोष॑ति । त्वे इति॑ ॥ १०.१०५.८
ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:105» मन्त्र:8
| अष्टक:8» अध्याय:5» वर्ग:27» मन्त्र:3
| मण्डल:10» अनुवाक:9» मन्त्र:8
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ब्रह्ममुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (नः) हमारे (वृजिना) वर्जनीय पाप छोड़ने योग्य पाप (अव शिशीहि) हे परमात्मन् ! क्षीण कर (अनृचः) मन्त्ररहितों को (ऋचा) मन्त्रोपदेश से (वनेम) हम सम्पर्क करें (अब्रह्मा यज्ञः) मन्त्ररहित यज्ञ (ऋधक्) केवल यज्ञ (त्वे) तुझ में-तेरे निमित्त (न जोषति) तुझे प्रीतिकर नहीं होता ॥८॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा की उपासना करनेवाले पापों से बचे रहते हैं और वे मन्त्ररहितों को मन्त्र का उपदेश करें तथा यज्ञ भी स्वयं तथा अन्य को मन्त्रों द्वारा करना-कराना चाहिये, मन्त्ररहित केवल यज्ञ शुष्क भोजन के समान होता है-ऐसे यज्ञ करनेवाले को परमात्मा अपना कृपापात्र नहीं बनाता ॥८॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार
अब्रह्मा [स्तुतिरहित] यज्ञ की हीनता
पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे प्रभो ! आप (नः) = हमारे (वृजना) = पापों को (अवशिशीहि) = हमारे से दूर करिये। (ऋचा) = स्तुति के द्वारा (अनृचः) = अस्तुत्य कर्मों को वनेम पराजित करें। स्तुति करते हुए हम ऐसे कर्मों से दूर रहें जो स्तुति के योग्य नहीं हैं । [२] (अब्रह्मा) = [ ब्रह्म = परिवृढं स्तोत्रं] स्तुतिरहित (यज्ञः) = यज्ञ (ऋधक्) = सचमुच (त्वे न जोषति) = तुझे प्रीणित करनेवाला नहीं होता । स्तुतिरहित यज्ञ में यज्ञकर्ता को गर्व हो जाने की आशंका है। ऐसा यज्ञ संगरहित न होने से सात्त्विक नहीं रहता। यज्ञ का अभिमान यज्ञ के उत्कर्ष को समाप्त कर देता है। यज्ञ के साथ स्तुति के होने पर उस यज्ञ को हम प्रभु से होता हुआ अनुभव करते हैं और इस प्रकार हमें यज्ञ का गर्व नहीं होता ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- स्तुति का फल यह है कि हमें उत्तम कर्मों का गर्व नहीं हो जाता, पाप हमारे से दूर रहता है ।
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ब्रह्ममुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (नः) अस्माकं (वृजिना) वृजिनानि वर्ज्यानि पापानि (अव शिशीहि) अवक्षीणानि तत् कुरु “शिशीते कृशं करोति” शो तनूकरणे लोटि विकरणव्यत्ययेन श्यनः स्थाने श्लुः” [ऋ० १।३६।१६ दयानन्दः] (अनृचः-ऋचा वनेम) ऋग्रहितान् ऋचा-ऋगुपदेशेन सम्भजेम, (अब्रह्मा यज्ञः) ब्रह्मरहितो मन्त्ररहितैः (ऋधक्) केवलो यज्ञः (त्वे) त्वयि (न जोषति) न रोचते “व्यत्ययेन परस्मैपदम्” ॥८॥
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डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - Reduce and remove our sin and crookedness. Let us win over the negationists with hymns of positive celebration of nature and divinity. Yajna, pursuit of knowledge and joint action, without grateful celebration of divinity with Vedic hymns does not at all win your approval and blessing.
