प्रास्तौ॑दृ॒ष्वौजा॑ ऋ॒ष्वेभि॑स्त॒तक्ष॒ शूर॒: शव॑सा । ऋ॒भुर्न क्रतु॑भिर्मात॒रिश्वा॑ ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
prāstaud ṛṣvaujā ṛṣvebhis tatakṣa śūraḥ śavasā | ṛbhur na kratubhir mātariśvā ||
पद पाठ
प्र । अ॒स्तौ॒त् । ऋ॒ष्वऽओ॑जाः॒ । ऋ॒ष्वेभिः॑ । त॒तक्ष॑ । शूरः॑ । शव॑सा । ऋ॒भुः । न । क्रतु॑ऽभिः । मा॒त॒रिश्वा॑ ॥ १०.१०५.६
ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:105» मन्त्र:6
| अष्टक:8» अध्याय:5» वर्ग:27» मन्त्र:1
| मण्डल:10» अनुवाक:9» मन्त्र:6
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ब्रह्ममुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (ऋष्वौजाः) महान् ओजस्वी परमात्मा (ऋष्वेभिः) महान् गुणों से उसका स्तुतिकर्ता (प्र अस्तौत्) बहुत स्तुति करता है, वह परमात्मा (शूरः) विक्रान्त (शवसा) अपने बल से (ततक्ष) इस जगत् को रचता है (ऋभुः-न) जैसे कोई शिल्पी रथकार रथ को रचता है (क्रतुभिः) कर्मों से (मातरिश्वा) महान् आकाश में गति करनेवाला व्यापनेवाला परमात्मा है ॥६॥
भावार्थभाषाः - महान् ओजस्वी परमात्मा अपने महान् गुणों से स्तुत किया जाना चाहिए, वह अपने बल से जगत् को रचता है और विविध कर्मों द्वारा महान् आकाश में भी व्यापनेवाला परमात्मा भासित होता है ॥६॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार
ऋष्वौजाः
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (ऋष्वौजाः) = दर्शनीय बलवाला अथवा व्याप्त बलवाला (ऋष्वेभिः) = दर्शनीय व व्यापक [=उदारतावाले] कर्मों से (प्रास्तौत्) = प्रभु का स्तवन करता है। प्रभु की उपासना वस्तुतः उन्हीं कर्मों से होती है जो सुन्दर हैं, उदारता को लिए हुए हैं । [२] (शूरः) = यह काम-क्रोधादि शत्रुओं का हिंसन करनेवाला (शवसा) = शक्ति के द्वारा (ततक्ष) = निर्माणात्मक कार्यों को करता है। यह (मातरिश्वा) = मातृगर्भ में बढ़नेवाला जीव (क्रतुभिः) = अपने कर्मों व प्रज्ञानों के द्वारा (ऋभुः न) = [उरु भाति] खूब देदीप्यमान प्रभु की तरह हो जाता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु का स्तवन सुन्दर व्यापक कर्मों के द्वारा होता है ।
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ब्रह्ममुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (ऋष्वौजाः) महौजस्वी “ऋष्वः-महन्नाम” [निघ० ३।३] (ऋष्वेभिः) महद्गुणैस्तस्य स्तुतिकर्त्ता (प्र अस्तौत्) प्रकृष्टं स्तौति स च परमात्मा (शूरः-शवसा ततक्ष) विक्रान्तो बलेन एतज्जगत्तक्षति करोति “तक्षति करोतिकर्मा” [निरु० ४।१९] (ऋभुः-न क्रतुभिः-मातरिश्वा) यथा कश्चिच्छिल्पी रथं तक्षति करोति-ऋभू रथस्याङ्गानि सन्दधत् परुषा परुः” कर्मभिः सोऽन्तरिक्षे महाकाशे व्याप्नुवन् सन् जगत् करोति “मातरिश्वा मातर्यन्तरिक्षे श्वसिति” [निरु० ७।२६] ॥६॥
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डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - Indra, glorious lord of omnipotence, is universally adored and served by cosmic forces and he, Matarishva, mighty presence active in universal nature, as Rbhu, cosmic architect, creates and structures the universe by his divine vision, intelligence and shaping powers.
