सचा॒योरिन्द्र॒श्चर्कृ॑ष॒ आँ उ॑पान॒सः स॑प॒र्यन् । न॒दयो॒र्विव्र॑तयो॒: शूर॒ इन्द्र॑: ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
sacāyor indraś carkṛṣa ām̐ upānasaḥ saparyan | nadayor vivratayoḥ śūra indraḥ ||
पद पाठ
सचा॑ । आ॒योः । इन्द्रः॑ । चर्कृ॑षे । आ । उ॒पा॒न॒सः । स॒प॒र्यन् । न॒दयोः॑ । विऽव्र॑तयोः । शूरः॑ । इन्द्रः॑ ॥ १०.१०५.४
ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:105» मन्त्र:4
| अष्टक:8» अध्याय:5» वर्ग:26» मन्त्र:4
| मण्डल:10» अनुवाक:9» मन्त्र:4
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ब्रह्ममुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्रः) ऐश्वर्यवान् परमात्मा (आयोः) स्तुति करनेवाले मनुष्य का (उपानसः) प्राणवाले आत्मा का समीपवर्ती (सपर्यन्) सेवन किया जाता हुआ (चर्कृषे) पुनः-पुनः दोषशोधन के लिये (विव्रतयोः) विविध कर्मवाले (नदयोः) अध्यात्मज्ञान के वक्ता श्रोताओं का (शूरः) प्रगतिप्रद (इन्द्रः) परमात्मा है ॥४॥
भावार्थभाषाः - स्तुति करनेवाले जन का परमात्मा समीपवर्ती है तथा उसके दिए वेद के वक्ता श्रोता मनुष्यों के दोषों का पुनः-पुनः शोधन करने के लिए जो यात्न करते हैं, उनको भी प्रगति देनेवाला है ॥४॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार
'इन्द्र' कौन है ?
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (आयोः सचा) = मनुष्य का सहायभूत औरों के साथ मिलकर चलनेवाला, (इन्द्रः) = यह जितेन्द्रिय पुरुष (आचकृषे) = सब कार्यों का करनेवाला होता है । इसके कार्य औरों के विरोध में नहीं होते। (उपानसः) = [अन: उपगतवान्] यह आरुढ़स्थ होता है, शरीररूप रथ का अधिष्ठाता बनता है । (सपर्यन्) = प्रभु की पूजा करनेवाला होता है । वस्तुतः औरों के अविरोध से सतत कार्यों में लगे रहने से ही यह प्रभु का उपासन करता है । [२] (विव्रतयोः) = विविध व्रतोंवाले, भिन्न-भिन्न कार्यों को करनेवाले (नदयोः) = कार्यों के द्वारा प्रभु का स्तवन करनेवाले इन्द्रियाश्वों के (शूरः) = [शृ हिंसायाम्] सब दोषों को नष्ट करनेवाला यह (इन्द्रः) = सचमुच इन्द्रियों का अधिष्ठाता होता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - इन्द्र वह है [क] जो औरों से मिलकर चलता है, [ख] कर्मों में लगा रहता है, [ग] शरीर रथ का अधिष्ठाता होता है, [घ] प्रभु की पूजा करता है, [ङ] इन्द्रिय दोषों को दूर करता है, इसके इन्द्रियाश्व अपने-अपने कार्यों के द्वारा प्रभु-स्तवन करनेवाले होते हैं।
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ब्रह्ममुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्रः) ऐश्वर्यवान् परमात्मा (आयोः) स्तोतुर्मनुष्यस्य “आयुर्मनुष्यनाम” [निघ० २।३] (उपानसः) अनसः समीपः प्राणवत आत्मनः समीपं वर्त्तमानः (सपर्यन्) सेव्यमानः सन् “कर्मणि कर्तृप्रत्ययः’ (चर्कृषे) पुनः-पुनः दोषशोधनाय (विव्रतयोः-नदयोः) विविधकर्मवतोः-अध्यात्मज्ञानस्योपदेशकश्रोत्रोः (शूरः-इन्द्रः) प्रगतिप्रदः “शूरः शक्तेर्गतिकर्मणः” [निरु० ३।१३] परमात्माऽस्ति ॥४॥
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डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - For the person dedicated to him, serving him and faithfully depending on him as the master, Indra is a friend and comrade and does every good thing for him, but for the vociferous and the refractory, he is a mighty awful punitive and corrective power.
