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क॒दा व॑सो स्तो॒त्रं हर्य॑त॒ आव॑ श्म॒शा रु॑ध॒द्वाः । दी॒र्घं सु॒तं वा॒ताप्या॑य ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

kadā vaso stotraṁ haryata āva śmaśā rudhad vāḥ | dīrghaṁ sutaṁ vātāpyāya ||

पद पाठ

क॒दा । व॒सो॒ इति॑ । स्तो॒त्रम् । हर्य॑ते । आ । अव॑ । श्म॒शा । रु॒ध॒त् । वारिति॒ वाः । दी॒र्घम् । सु॒तम् । वा॒ताप्या॑य ॥ १०.१०५.१

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:105» मन्त्र:1 | अष्टक:8» अध्याय:5» वर्ग:26» मन्त्र:1 | मण्डल:10» अनुवाक:9» मन्त्र:1


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ब्रह्ममुनि

इस सूक्त में परमेश्वर संसार का उत्पादक, धारक तथा स्तुति करनेवालों का रक्षक वर्धक है, नास्तिकों का नाशक है, उसकी स्तुति संसारसागर से पार करनेवाली है, इत्यादि विषय हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - (वसो) हे वसानेवाले परमात्मन् ! (स्तोत्रम्) स्तुतिवचन को (हर्यते) कामना करते हुए-चाहते हुए भी प्रार्थना करता हूँ (श्मशा) शरीर में व्यापनेवाली रक्तवाहिनी-नाडी (वाः) जल-मानव  की बीजशक्ति को (अवरुधत्) जो रोकती है (वाताप्याय) प्राण वायु से बढ़े हुए (दीर्घं सुतम्) दीर्घ आयुवाला जो बल है, उससे (कदा) मुझे कभी भी अपना दर्शन देगा ॥१॥
भावार्थभाषाः - संसार में और मोक्ष में बसानेवाले परमात्मा से स्तुतिवचनों द्वारा प्रार्थना करनी चाहिए कि जो शरीर में वीर्य का स्तम्भन करनेवाली नाड़ी से जो अलौकिक बल प्राप्त होता है, उससे सुखदर्शन कभी न कभी देने की कृपा करे, निश्चय वह दर्शन देगा ॥१॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सोम [वीर्य] रक्षण से सोम [प्रभु] दर्शन

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (वसो) = हम सबके बसानेवाले प्रभो ! (हर्यते) = [हर्य गतिकान्योः ] सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की गति के मूलस्रोत कान्तिमान् आपके लिए (कदा) = कब (स्तोत्रम्) = स्तोत्र को (आ) = सब प्रकार से (अवरुधत्) = अपने में निरुद्ध व स्थापित करनेवाला होता है ? जब भी इन स्तोत्रों को अपने में निरुद्ध करनेवाला होता है तो (श्मशाः) = [ श्मनि शेते शरीर में शयन करनेवाला] यह जीव (वा:) = जलरूप वीर्यकणों को (अवरुधत्) = अपने शरीर में ही निरुद्ध करता है। प्रभु की उपासना से वासनाओं का आक्रमण नहीं होता। इस प्रकार यह वीर्य को अपने में निरुद्ध कर पाता है। [२] यह (दीर्घम्) = दीर्घकाल तक चलनेवाला, जीवन के तीनों सवनों में चलनेवाला [प्रातः सवन - प्रथम २४ वर्ष, माध्यन्दिन सवन = अगले ४४ वर्ष, तृतीय सवन = अन्तिम ४८ वर्ष] (सुतम्) = सोम का सम्पादन (वाताप्याय) = [वातेन आप्यते इति वाताप्यः - प्राणनिरोध के द्वारा प्राप्त होनेवाला प्रभु] प्रभु प्राप्ति के लिए होता है । उपासना से सोम का रक्षण होता है, रक्षित सोम प्रभु प्राप्ति का साधन बनता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम प्रभु-स्तवन द्वारा वासनाओं से बचकर, सोम का रक्षण करें। सोम-रक्षण के द्वारा हम प्रभु का दर्शन करनेवाले होंगे।
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ब्रह्ममुनि

अत्र सूक्ते परमेश्वरः संसारस्योत्पादयिता धारकश्च स्तुतिकर्तॄणां च रक्षको वर्धयिता नास्तिकानां नाशकस्तस्य स्तुतिः संसारसागरात् तारयित्रीत्येवमादयो विषयाः सन्ति।

पदार्थान्वयभाषाः - (वसो) हे वासयितः परमात्मन् ! (स्तोत्रम्) स्तुतिवचनं (हर्यते) हर्यतं कामयमानम् “द्वितीयार्थे चतुर्थी व्यत्ययेन” त्वां प्रार्थये (श्मशा) श्म-शरीरमश्नुते या रसरक्तवहा नाडी “श्मश श्माश्नुते” [निरु० ५।१२] ‘श्म शरीरम्’ [निरु० ३।५] (वाः) जलम् “वाः-बाह्यमुदकम्” [यजु० ५।११ दयानन्दः] “यदवृणोत्तस्माद्वाः जलम्” [श० ६।१।१।९] शरीररसं मानवबीजं वा (अवरुधत्) अवरोधयति सा संयता नाडी (वाताप्याय) वाताप्यम् ‘पूर्ववत् द्वितीयास्थाने चतुर्थी’ वातेन प्राणवायुनाऽऽप्यायमानं (दीर्घं सुतम्) दीर्घायुष्कं सुतं बलमस्ति तस्मात् (कदा) मह्यं कदा-कदापि स्वदर्शनं दास्यसीति शेषः ॥१॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O Vasu, shelter home of life, when does the spirit inspire, impel and create the joyous song of celebration for Indra? When it controls the various flow of the mind, then the lasting soma is prepared for the ecstatic soul.