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अ॒पो म॒हीर॒भिश॑स्तेरमु॒ञ्चोऽजा॑गरा॒स्वधि॑ दे॒व एक॑: । इन्द्र॒ यास्त्वं वृ॑त्र॒तूर्ये॑ च॒कर्थ॒ ताभि॑र्वि॒श्वायु॑स्त॒न्वं॑ पुपुष्याः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

apo mahīr abhiśaster amuñco jāgar āsv adhi deva ekaḥ | indra yās tvaṁ vṛtratūrye cakartha tābhir viśvāyus tanvam pupuṣyāḥ ||

पद पाठ

अ॒पः । म॒हीः । अ॒भिऽश॑स्तेः । अ॒मु॒ञ्चः॒ । अजा॑गः । आ॒सु॒ । अधि॑ । दे॒वः । एकः॑ । इन्द्र॑ । याः । त्वम् । वृ॒त्र॒ऽतूर्ये॑ । च॒कर्थ॑ । ताभिः॑ । वि॒श्वऽआ॑युः । त॒न्व॑म् । पु॒पु॒ष्याः॒ ॥ १०.१०४.९

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:104» मन्त्र:9 | अष्टक:8» अध्याय:5» वर्ग:25» मन्त्र:4 | मण्डल:10» अनुवाक:9» मन्त्र:9


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्र) हे ऐश्वर्यवन् परमात्मन् ! (महीः-अपः) महागुणवाली आप्त प्रजाओं-अर्थात् जीवन्मुक्त आप्त जनों को (अभिशस्तेः) हिंसित करनेवाली मृत्यु से (अमुञ्चः) चुराता है (आसु-अधि) इन आप्त प्रजाओं में-आप्त जनों में अधिष्ठित रक्षक (एकः-देवः) तू एक देव (अजागः) जगाता है (याः) जिन आप्त प्रजाओं-आप्त जनों को (त्वम्) तू (वृत्रतूर्ये) अज्ञाननाशार्थ (चकर्थ) समर्थ बनाता है (ताभिः) उनके लिए (विश्वम्-आयुः) सब जीवनपर्यन्त (तन्वं पुपुष्याः) शरीर को पुष्ट करता है, समृद्ध बनाता है ॥९॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा आप्त जनों-जीवन्मुक्त उपासक जनों को मृत्यु से बचाता है और उन्हें अज्ञान नष्ट करने को समर्थ करता है, उन्हें पदे पदे सावधान करता है-जगाता है, आयुपर्यन्त शरीर को समृद्ध करता है ॥९॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

रेतः कणों के रक्षण में अप्रमाद

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (इन्द्र) = हे जितेन्द्रिय पुरुष ! तू (महीः) = इन महत्त्वपूर्ण (अपः) = रेतः कणों को (अभिशस्ते:) = [अभिशंस्=to attack] वासनाओं के आक्रमण से (अमुञ्चः) = मुक्त कर । (आसु अधि अजाग:) = इनके विषय में तू खूब ही जाग, अप्रमत्त हो। तू इनके रक्षण से (देवः) = देव बनेगा, (एकः) = अद्वितीय होगा । गत मन्त्र के अनुसार सुरक्षित हुए हुए ये रेतःकण हमें देव व मनुष् बनाते हैं, हमारे दिव्यगुणों को बढ़ाते हैं और हमें विचारशील बनाते हैं । [२] हे इन्द्र ! (वृत्रतूर्ये) = वासना के संहार के होने पर (त्वम्) = तू (याः) = जिन रेतः कणों को (चकर्थ) = अपने अन्दर सुरक्षित करता है (ताभिः) = उनसे (विश्वायुः) = पूर्ण जीवनवाला होता हुआ तू (तन्वम्) = अपने शरीर को (पुपुष्याः) = पुष्ट करनेवाला हो, इन रेतः कणों से ही शरीर का अंग-प्रत्यंग सशक्त बना रहता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - वासनाओं के आक्रमण से अपने को मुक्त करके जब हम रेतःकणों के विषय में अप्रमत्त होते हैं तो हम देवत्व को प्राप्त करके जीवन को उत्कृष्ट बनाते हैं, पूर्ण जीवनवाले बनकर शरीर को पुष्ट करते हैं ।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्र) हे ऐश्वर्यवन् परमात्मन् ! (महीः-अपः-अभिशस्तेः अमुञ्चः) महागुणवतीराप्ताः प्रजाः-जीवन्मुक्तान्-आप्तजनान्-अभिशासति-आभिमुख्येन हिनस्ति यः स मृत्युः “शंसु हिंसायाम्” [भ्वादि०] तस्मात् खलु मुञ्चसि (आसु-अधि-एकः-देवः-अजागः) आसु ह्याप्तप्रजासु ह्यधिष्ठितो-रक्षकस्त्वमेवैको जागरयसि (याः-त्वं वृत्रतूर्ये चकर्थ) याः-आप्तप्रजास्त्वमावरकाज्ञाननाशाय समर्थाः करोषि ( ताभिः) ताभ्यः “व्यत्ययेन चतुर्थीस्थाने तृतीया” (विश्वम्-आयुः-तन्वं पुष्याः) सर्वजीवनपर्यन्तं शरीरं पोषयसि, व्यत्ययेन श्लुः ॥९॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - The great streams of water which you released from ignominious self-containment, i.e., from the hoarding clouds and the adamantine mountains, and over which you, the sole one divinity, keep relentless watch, ever awake, Indra, those which you brought into being by breaking the cloud and whatever else you did, by the same streams, O life of life, nourish and promote the body and health of all living beings of the world.