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स॒प्तापो॑ दे॒वीः सु॒रणा॒ अमृ॑क्ता॒ याभि॒: सिन्धु॒मत॑र इन्द्र पू॒र्भित् । न॒व॒तिं स्रो॒त्या नव॑ च॒ स्रव॑न्तीर्दे॒वेभ्यो॑ गा॒तुं मनु॑षे च विन्दः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

saptāpo devīḥ suraṇā amṛktā yābhiḥ sindhum atara indra pūrbhit | navatiṁ srotyā nava ca sravantīr devebhyo gātum manuṣe ca vindaḥ ||

पद पाठ

स॒प्त । आपः॑ । दे॒वीः । सु॒ऽरणाः॑ । अमृ॑क्ताः । याभिः॑ । सिन्धु॑म् । अत॑रः । इ॒न्द्र॒ । पूः॒ऽभित् । न॒व॒तिम् । स्रो॒त्याः । नव॑ । च॒ । स्रव॑न्तीः । दे॒वेभ्यः॑ । गा॒तुम् । मनु॑षे । च॒ । वि॒न्दः॒ ॥ १०.१०४.८

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:104» मन्त्र:8 | अष्टक:8» अध्याय:5» वर्ग:25» मन्त्र:3 | मण्डल:10» अनुवाक:9» मन्त्र:8


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्रः) हे ऐश्वर्यवन् परमात्मन् ! (पूर्भित्) देहपुरों-मन बुद्धि चित्ताहङ्कार को भेदन करनेवाला तू (सप्त देवीः) सप्त-सर्पणशील दिव्य गुणवाली (सुरणाः) सुरमणीय (अमृक्ताः), अहिंसनीय-अमर (आपः) आप्त प्रजाएँ-जीवन्मुक्त जन (याभिः) जिन जीवन्मुक्त प्रजाओं-जीवन्मुक्त आत्माओं को (सिन्धुम्-अतरः) संसारसागर से तराता है (नव-च नवतिं च) नौ संख्यावाली गति प्रवृत्तियाँ-पाँच ज्ञानेन्द्रियों की चार अन्तःकरण मन बुद्धि चित्त अहङ्कार की (स्रवन्तीः) आत्मशक्ति को रिसाती हुई-झिराती हुई (स्रोत्याः-च) और बहती हुइयों से तराता है (देवेभ्यः) विद्वानों के लिए और मननशील मनुष्य के लिए (गातुं-विन्द) जीवनमार्ग को प्राप्त कराता है ॥८॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा आप्त मनुष्यों के मन आदि को वृत्तिरहित करके छिन्न-भिन्न कर देता है, जीवन्मुक्तों को संसारसागर से पार करता है और आत्मशक्ति को झिरानेवाली पाँच ज्ञानेन्द्रियों की वृत्ति और चार मन बुद्धि चित्त अहङ्कार बहती नदी के समान इन नौ वृत्तियों से भी पार कराता है तथा जीवन्मार्ग को प्राप्त कराता है ॥८॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

देवत्व मनुष्यत्व

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (सप्त) = [सर्पणस्वभावाः सा० ] गतिशील सर्पण के स्वभाववाले, (आपः) = रेतः कण (देवी:) = शरीर में रोगों के जीतने की कामनावाले हैं [विजिगीषा]। वीर्यकण रोगकृमियों को आक्रान्त करके नष्ट करते हैं। (सुरणा:) = ये शरीर में सुष्ठ रममाण होते हैं, शरीर की शोभा के कारण बनते हैं अथवा [रणशब्दे] उत्तम शब्द शक्ति का कारण होते हैं। इन सोमकणों के रक्षण से वाणी की शक्ति बड़ी ठीक बनी रहती है। (अमृक्ताः) = ये अहिंसित हैं, रोगकृमि इन्हें आक्रान्त नहीं कर पाते। [२] (इन्द्र) = जितेन्द्रिय पुरुष ! ये सोमकण वे हैं, (याभिः) = जिनसे (सिन्धं अतरः) = भवसागर को तू तैरनेवाला होता है। (पूर्भित्) = इस शरीररूप पुरी का भेदन करके, जन्म-मरण के चक्र से ऊपर उठ के तू कैवल्य को प्राप्त करता है। [३] तू इन रेतःकण रूप (नवतिं नव च) = ९९ वर्ष पर्यन्त स्त्रवन्ती (स्त्रोत्याः) = बहनेवाली नदियों को (देवेभ्यः) = देवों के लिए (मनुषे च) = और विचार पुरुष के लिए (गातुम्) = जाने के लिए (विन्दः) = प्राप्त करता है। इन रेतःकणों के द्वारा तू देव व मनुष्य बनता है । हृदय में दिव्य गुणों के विकास के द्वारा तू देव बनता है और मस्तिष्क में विचारशीलता के द्वारा तू मनुष्य कहलाता है। इस देवत्व व मनुष्यत्व की ओर जाने के लिए ये रेतःकण साधन बनते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - शरीर में रक्षित हुए हुए रेतः कण शरीर को शोभा वाला तथा रोगों से अहिंसित बनाते हैं। इनके रक्षण से हम दिव्यगुणोंवाले व विचारशील बनते हैं ।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्र) हे ऐश्वर्यवन् परमात्मन् ! (पूर्भित्) देहपुरान् भेत्ता त्वं (सप्त देवीः सुरणाः-अमृक्ताः-आपः) सृप्ताः-सर्पणशीला दिव्यगुणाः सुरमणीया अमराः-“अमृक्तः-अन्यैरहिंस्यः” [ऋ० ३।११।६ दयानन्दः] आप्ताः प्रजा जीवन्मुक्ता जनाः “मनुष्या वा आपश्चन्द्राः” [श० ७।३।१।२०] (याभिः) याः “व्यत्ययेन द्वितीयास्थाने तृतीया” जीवन्मुक्ताः प्रजाः-मनुष्यान् (सिन्धुम्-अतरः) संसारसागरं तारयसि “अन्तर्गतणिजर्थः” (नव च नवतिं च स्रवन्तीः स्रोत्याः-च) नवसङ्ख्याकाः गतिप्रवृतीश्च पञ्चज्ञानेन्द्रियाणां चतस्रश्चान्तःकरणानामात्मशक्तिं स्रावयन्तीः स्रोत्या वहन्तीस्तारयसि (देवेभ्यः-मनुषे च गातुं विन्दः) विद्वद्भ्यो मननशीला यत्र जीवमार्गं प्रापयसि ॥८॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indra, lord breaker of the strongholds of darkness, want and negativities, seven are the divine streams which flow free and unobstructed, by which you fill the sea and help us cross it, ninety are the streams flowing, and nine the sources of the flow by which you bless the divines and humans to find and follow the paths of life to the destination.