पदार्थान्वयभाषाः - [१] (सप्त) = [सर्पणस्वभावाः सा० ] गतिशील सर्पण के स्वभाववाले, (आपः) = रेतः कण (देवी:) = शरीर में रोगों के जीतने की कामनावाले हैं [विजिगीषा]। वीर्यकण रोगकृमियों को आक्रान्त करके नष्ट करते हैं। (सुरणा:) = ये शरीर में सुष्ठ रममाण होते हैं, शरीर की शोभा के कारण बनते हैं अथवा [रणशब्दे] उत्तम शब्द शक्ति का कारण होते हैं। इन सोमकणों के रक्षण से वाणी की शक्ति बड़ी ठीक बनी रहती है। (अमृक्ताः) = ये अहिंसित हैं, रोगकृमि इन्हें आक्रान्त नहीं कर पाते। [२] (इन्द्र) = जितेन्द्रिय पुरुष ! ये सोमकण वे हैं, (याभिः) = जिनसे (सिन्धं अतरः) = भवसागर को तू तैरनेवाला होता है। (पूर्भित्) = इस शरीररूप पुरी का भेदन करके, जन्म-मरण के चक्र से ऊपर उठ के तू कैवल्य को प्राप्त करता है। [३] तू इन रेतःकण रूप (नवतिं नव च) = ९९ वर्ष पर्यन्त स्त्रवन्ती (स्त्रोत्याः) = बहनेवाली नदियों को (देवेभ्यः) = देवों के लिए (मनुषे च) = और विचार पुरुष के लिए (गातुम्) = जाने के लिए (विन्दः) = प्राप्त करता है। इन रेतःकणों के द्वारा तू देव व मनुष्य बनता है । हृदय में दिव्य गुणों के विकास के द्वारा तू देव बनता है और मस्तिष्क में विचारशीलता के द्वारा तू मनुष्य कहलाता है। इस देवत्व व मनुष्यत्व की ओर जाने के लिए ये रेतःकण साधन बनते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - शरीर में रक्षित हुए हुए रेतः कण शरीर को शोभा वाला तथा रोगों से अहिंसित बनाते हैं। इनके रक्षण से हम दिव्यगुणोंवाले व विचारशील बनते हैं ।