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स॒हस्र॑वाजमभिमाति॒षाहं॑ सु॒तेर॑णं म॒घवा॑नं सुवृ॒क्तिम् । उप॑ भूषन्ति॒ गिरो॒ अप्र॑तीत॒मिन्द्रं॑ नम॒स्या ज॑रि॒तुः प॑नन्त ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

sahasravājam abhimātiṣāhaṁ suteraṇam maghavānaṁ suvṛktim | upa bhūṣanti giro apratītam indraṁ namasyā jarituḥ pananta ||

पद पाठ

स॒हस्र॑ऽवाजम् । अ॒भि॒मा॒ति॒ऽसह॑म् । सु॒तेऽर॑णम् । म॒घऽवा॑नम् । सु॒ऽवृ॒क्तिम् । उप॑ । भू॒ष॒न्ति॒ । गिरः॑ । अप्र॑तिऽइतम् । इन्द्र॑म् । न॒म॒स्याः । ज॒रि॒तुः । प॒न॒न्त॒ ॥ १०.१०४.७

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:104» मन्त्र:7 | अष्टक:8» अध्याय:5» वर्ग:25» मन्त्र:2 | मण्डल:10» अनुवाक:9» मन्त्र:7


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सहस्रवाजम्) बहुत बलवान् (अभिमातिषाहम्) अभिमानी शत्रु का अभिभव करनेवाले (सुतेरणम्) उत्पन्न जगत् में रममाण (सुवृक्तिम्) शोभन स्तुतिवाले (मघवानम्) ऐश्वर्यवान् (अप्रतीतम्) किसी से भी आक्रमण के अयोग्य या तुलना से रहित (इन्द्रम्) परमात्मा को (जरितुः) स्तुति करनेवाले की (गिरः) स्तुतियाँ (उप भूषन्ति) प्रसिद्ध करती हैं (नमस्याः) प्रार्थनाएँ (पनन्त) प्रशंसित करती हैं ॥७॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा बहुत बलवान्, अभिमानी को दबानेवाला, किसी से आक्रमण अयोग्य, प्रेरणारहित है, स्तुति करनेवाले अपनी स्तुतियों से उसे प्रसिद्ध करते हैं, वह स्तुति के योग्य है, उसकी स्तुति करनी चाहिए ॥७॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

प्रभु-स्तवन से शक्ति की प्राप्ति

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (गिरः) = स्तुति वाणियाँ (इन्द्रम्) = उस परमैश्वर्यवान् प्रभु को (उपभूषन्ति) = अलंकृत करती हैं, जो प्रभु (सहस्रवाजम्) = अपरिमित बलवाले हैं, (अभिमातिषाहम्) = काम-क्रोधादि हिंसक शत्रुओं का अभिभव करनेवाले हैं, (सुते-रणम्) = इस उत्पन्न जगत् में सर्वत्र रममाण हैं अथवा सोम के उत्पादन के होने पर हमारे में रमण करनेवाले हैं, (सुवृक्तिम्) = शोभन स्तुतिवाले व अच्छी प्रकार हमारे पापों का वर्जन करनेवाले हैं, (अप्रतीतम्) = किन्हीं भी शत्रुओं से आक्रान्त न होनेवाले हैं। प्रभु का स्तवन करते हुए हम भी अत्यधिक बलवाले होकर शत्रुओं से आक्रान्त नहीं होते । [२] इसी कारण (जरितुः) = स्तोता की (पनस्याः) = स्तुतियाँ (पनन्त) = उस प्रभु का स्तवन करती है । इन स्तवनों से ही स्तोता को शक्ति प्राप्त होती है और वह कामादि शत्रुओं का पराभव करता हुआ प्रभु का अधिकाधिक प्रिय होता जाता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ-हम प्रभु-स्तवन करें। यह स्तवन हमें शक्ति देगा और हम शत्रुओं को पराभूत करके पवित्र व शान्त जीवन बितानेवाले होंगे।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सहस्रवाजम्) बहु बलवन्तम् (अभिमातिषाहम्) अभिमानिनं शत्रुमभिभवति यस्तं (सुतेरणम्) सुते उत्पन्ने जगति रममाणं (सुवृक्तिम्) शोभनस्तुतिकम् (मघवानम्) ऐश्वर्यवन्तं (अप्रतीतम्) केनापि न प्रतिगन्तव्यं यद्वा प्रतिमानरहितं (इन्द्रम्) परमात्मानम् (जरितुः) स्तोतुः (गिरम्-उप भूषन्ति) स्तुतयः प्रसिद्धं कुर्वन्ति (नमस्याः पनन्त) प्रार्थनाः प्रशंसन्ति “पनन्त प्रशंसेयुः” [यजु० ३३।२८ दयानन्दः] ॥७॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Him, who is lord of a thousand powers, subduer of challenging enmities, lover of soma and his own creation, mighty glorious, adorable, matchless Indra, songs of adoration exalt and salutations of celebrants praise.