पदार्थान्वयभाषाः - [१] (हर्यश्व) = प्रकाशमय इन्द्रियाश्वोंवाले (इन्द्र) = परमैश्वर्यशालिन् प्रभो ! (सुष्टोः) = सुष्ठ, स्तूयमान (सुषुम्नस्य) = उत्तम आनन्द व उत्तम धनवाले (पुरुरुचः) = अतिशयित [ बहुत अधिक] ज्ञानदीप्तिवाले ते आपके (प्रणीतिभिः) = प्रणयनों से, हृदयस्थ आपकी प्रेरणा के अनुसार चलने से तब (सूनृताभि:) = आपकी इन वेद प्रतिपादित सूनृत वाणियों से (स्तोतारः जनासः) = स्तुति करनेवाले लोग (मंहिष्ठाम्) = [दातृतमा] अधिक से अधिक धनों के देनेवाली (ऊतिम्) = [Aid, assistamce, help ] धनादि की सहायता को (वितिरे) = अर्थियों में, याचकों में वितरण के लिए (दधानाः) = धारण करते हुए होते हैं । [२] प्रभु का स्तवन दो प्रकार से होता है । एक तो प्रभु प्रेरणाओं के अनुसार चलने से [प्रणीतिभिः], दूसरे वेद की सूनृत वाणियों को अपनाने से । प्रभु सुषुम्न हैं, पुरुरुच् हैं । उपासक को भी आनन्दमयी मनोवृत्तिवाला बनने का प्रयत्न करना चाहिए तथा अधिक से अधिक ज्ञानदीप्ति को प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिए। [३] प्रभु जो भी धन हमें प्राप्त कराएँ, हम उस धन को वितरण व दान में विनियुक्त करें। धन का उद्देश्य अपने भोग-विलास के साधनों का बढ़ाना नहीं है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ-उस आनन्दमय ज्ञानदीत प्रभु की प्रेरणाओं के अनुसार चलें तथा सूनृत वाणियों का प्रयोग करें। प्रभु से प्राप्त कराये गये धन का दान में विनियोग करें।