पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (शचीवः) = सर्वशक्तिमन् (इन्द्र) = परमैश्वर्यशालिन् प्रभो ! (उशिजः) = मेधावी (ऋतज्ञाः) = ऋत के जाननेवाले, अपने जीवन में ऋत के अनुसार कार्य करनेवाले (मनुषः) = विचारशील लोग (तव) = आपकी (ऊती) = रक्षा के द्वारा आप से रक्षण को प्राप्त करके तथा (वीर्येण) = आपकी शक्ति से, अर्थात् आपसे शक्ति को प्राप्त करके (प्रजावत्) = सब शक्तियों के विकासवाले [प्रजन् - प्रादुर्भाव ] (वयः) = जीवन को (दधानाः) = धारण करते हुए होते हैं । हम मेधावी बनने का प्रयत्न करें, ऋत के अनुसार कार्यों को करनेवाले हों। इससे हमें प्रभु का रक्षण प्राप्त होगा, प्रभु हमारे जीवन को शक्तिशाली बनाएँगे। इस रक्षण व शक्ति से हमारे जीवन का उत्तम विकास होगा। [२] इस उत्तम विकास को प्राप्त करनेवाले उपासक (गृणन्तः) = प्रभु का स्तवन करते हुए (सधमाद्यासः) = प्रभु के साथ आनन्द का अनुभव करते हुए (दुरोणे) = इस शरीर गृह में, जिसमें से कि सब बुराइयों का [दुर्] अपनयन [ओण्] हुआ है, (तस्थुः) = स्थित होते हैं। शरीर में स्थित होने का भाव यह है कि इनकी चित्तवृत्ति इधर-उधर भटकती नहीं, ये सदा औरों को ही नहीं देखते रहते । मनोनिरोध के द्वारा अन्दर ही स्थित होते हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु के रक्षण व शक्तिदान से हमारा जीवन उत्कृष्ट बनता है। हम मेधावी व ऋत के पालन करनेवाले बनकर इस शरीर गृह में स्तवन करते हुए व प्रभु के साथ आनन्द को अनुभव करते हुए स्थित होते हैं ।