पदार्थान्वयभाषाः - प्रभु जीव से कहते हैं कि हे अग्ने प्रगतिशील जीव ! तू (हि) = निश्चय से (उभे) = इन दोनों द्यावापृथिवी = मस्तिष्क रूप द्युलोक तथा शरीर रूप पृथिवी को (सदा) = सदा (आततन्थ) = सब प्रकार से विस्तृत करता है, उसी प्रकार (न) = जैसे कि (पुत्रः) = एक पुत्र (मातरा) = अपने माता-पिता के यश को विस्तृत करता है उसी प्रकार प्रस्तुत मन्त्र का ऋषि त्रित भी अपने मस्तिष्क व शरीर की शक्तियों को फैलानेवाला होता है। यहाँ 'द्यौ पिता, पृथिवी माता' इन शब्दों के अनुसार द्युलोक पिता है और पृथिवीलोक माता है। हमें मस्तिष्क ही उज्ज्वलता तथा शरीर की दृढ़ता से इन्हें यशस्वी बनाना है । हे (यविष्ठ) = बुराई को अपने से दूर करनेवाले तथा अच्छाई को अपने साथ संगत करनेवाले जीव ! तू (उशतः) = तेरा हित चाहनेवाले इन देवों के प्रति तू (प्रयाहि) = प्रकर्षेण आनेवाला बन । (अथ) = और हे (सहस्य) = सहस् में उत्तम अर्थात् उत्तम सहनशक्ति वाले जीव तू (इह) = इस जीवन में (देवान्) = दिव्यगुणों को (आवह) = सब प्रकार से प्राप्त करा । देवताओं के सम्पर्क में आने से बुराई दूर होकर अच्छाई के साथ हमारा मेल होता है, हम 'यविष्ठ' बनते हैं हमारी क्रोध आदि की वृत्ति दूर होकर हमारे में सहन की वृत्ति पैदा होती है। हम 'सहस्य' बनते हैं। यह सहस्य बनना ही वस्तुतः धर्म मार्ग में अग्रसर होने का चिह्न है । देव लोग कभी हमें कुछ कटु प्रतीत होनेवाली बात कहते भी हैं तो वह हमारे हित की भावना से ही कही जाती है, सो हमें उसे सहना ही चाहिए।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम मस्तिष्क व शरीर दोनों का विकास करें। देवों की ओर जाते हुए जीवन में दिव्यगुणों को बढ़ायें। सूक्त का प्रारम्भ त्रित के जीवन के चित्रण से होता है। यह त्रित प्रातः उठता है। भ्रमण के बाद स्वाधाय में लगता है दिनभर ज्ञानपूर्वक क्रियाओं को करता हुआ अपने सब कोशों की न्यूनता को दूर करता है। [१] वह ज्ञान व स्वास्थ्य का सम्पादन करता है, ओषधियों पर ही शरीर का पोषण करता है। ज्ञानी व तीव्र बुद्धि बनकर ज्ञानरश्मियों को प्राप्त करता है । [२] व्यापक उन्नतिवाला बनकर मोक्षरूप [ब्रह्मस्थिति] तृतीय धाम में विचरता है, मधुर ही शब्द बोलता है और समझदार होकर प्रभु का अर्चन करता है । [३] ये जहाँ जाता है वहाँ सदा सुकाल रहता है और लोग इसे अन्न की भेंट प्राप्त कराते हैं। [४] यह शरीर रूप वस्त्र को शुद्ध रखता है, यज्ञमय जीवनवाला होता है, अपने साथ दिव्यगुणों को संगत करता है। [६] शरीर व मस्तिष्क दोनों की ही शक्ति का विस्तार करता है। [७] द्वितीय सूक्त में भी इसी त्रित के जीवन का चित्रण करते हुए कहते हैं कि-