'जन' द्वारा प्रभु का आतिथ्य
पदार्थान्वयभाषाः - गतमन्त्र में प्रभु को 'होता' कहा था, उसी शब्द से प्रभु का स्मरण करते हुए कहते हैं कि हम (तु) = तो उस प्रभु का स्मरण व स्तवन करते हैं जो कि (होतारम्) = वस्तुतः ही सब आवश्यक पदार्थों के देनेवाले हैं, (चित्ररथम्) = हमारे इस शरीर रूप रथ को अद्भुत बनानेवाले हैं । इसी प्रकार हमारा भी यह शरीर रूप रथ जब प्रभु से अधिष्ठित होता है तो इस पर कामादि वासनाओं का आक्रमण नहीं हो पाता। उस समय हमारे जीवन से हिंसारहित उत्तम ही कर्म होते हैं, वे प्रभु (अ- ध्वरस्य) = सब प्रकार की हिंसा से शून्य (यज्ञस्य यज्ञस्य) = प्रत्येक उत्तम कर्म के (केतुम्) = प्रकाशक हैं। प्रभु कृपा से हमारे जीवन में यज्ञों का ही प्रकाश होता है, हम कोई भी अयज्ञिय कर्म नहीं करते। रुशन्तम्-वे प्रभु देदीप्यमान हैं, ज्ञान के पुञ्ज हैं। वे प्रभु (मह्ना) = अपनी महिमा से व (श्रित्या) = श्री से (देवस्य देवस्य) = प्रत्येक देव की (प्रत्यर्धिम्) = [ऋध् णिच्-अर्धमति] उस-उस ऋद्धि को प्राप्त करानेवाले हैं। सूर्य, चन्द्र, तारे, पृथिवी व समुद्र ये सब उस प्रभु से ही अपनी महिमा व श्री को प्राप्त करते हैं । उपनिषद् ठीक ही कहती है कि- 'तस्य भासा सर्वमिदं विभाति' उस प्रभु की दीप्ति से ही यह सब देदीप्यमान हो रहा है। 'तेन देवा देवतामग्र आयन्' उस प्रभु से ही देव - देवता को प्राप्त करते हैं। मनुष्य देवों को भी देवत्व प्रभु कृपा से ही मिलता है, बुद्धिमानों की बुद्धि, तेजस्वियों का तेज व बलवानों का बल प्रभु ही हैं। इस प्रकार (अग्निम्) = वे प्रभु ही अग्नि हैं, अग्रेणी हैं, वे हम सब को आगे ले चल रहे हैं। मार्गदर्शक व शक्ति को देनेवाले वे प्रभु ही हैं। वे प्रभु (जनानाम्) = अपनी शक्तियों का विकास करने वालों के (अतिथिम्) = अतिथि हैं। प्रभु के स्वागत करने का श्रेय उन्हीं को प्राप्त होता है जो कि अपनी शक्तियों के विकास के लिये प्रयत्नशील हों। हम करें तो कुछ नहीं, बस थोथा कीर्तन ही करते रहें, तो इससे प्रभु थोड़े ही मिल जाएँगे ? प्रभु प्राप्ति के लिये तो 'जन' बनना होता है, 'पाँचों प्राणों, ज्ञानेन्द्रियों व कर्मेन्द्रियों' की शक्ति को विकसित करके अपने 'पञ्चजन' इस नाम को चरितार्थ करना होता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम पञ्चजन बनें, प्रभु हमें प्राप्त होंगे।