पदार्थान्वयभाषाः - (इत्था) = इस प्रकार से, अर्थात् उपरले मन्त्रों में वर्णित प्रकार से जीवन बिताने पर यह त्रित (विष्णुः) = व्यापक उन्नतिवाला होता है [विष् व्याप्तौ], 'शरीर, मन व बुद्धि' सभी का विकास करता हुआ यह तीन कदमों को रखनेवाला त्रिविक्रम विष्णु होता है । यह (अस्य) = इस त्रित का (परमं) = सर्वोत्कृष्ट विकास होता है। यह विद्वान् ज्ञानी तो बनता ही है, (जातः) = सब शक्तियों का विकास करता हुआ [जन्= प्रादुर्भावे ] यह (बृहत् तृतीयम्) = उस महान् तृतीय धाम को (अभिपाति) = जीवन में या जीवन के पश्चात् दोनों ओर सुरक्षित करता है। 'तृतीये धामन् अध्यैरयन्त'-देव लोग तृतीय धाम में विचरते हैं। 'प्राकृतिक भोगों से ऊपर उठना' ही प्रकृति के घर से बाहर आ जाना है 'लोकैषणा, वित्तैषणा, पुत्रैषणा' से ऊपर उठ जाना ही 'जीव' से ऊपर उठना है। यह 'वित्त लोक व पुत्र' की इच्छाओं से ऊपर उठा हुआ पुरुष तृतीय धाम 'प्रभु' में विचरता है। इस जीवन में ही यह जीवन्मुक्त व ब्रह्मनिष्ठ हो जाता है और मृत्यु के बाद तो परामुक्ति को प्राप्त करके यह ब्रह्म में विचरता ही है। यही तृतीय धाम का अभिरक्षण है। यह वह स्थिति होती है (यद्) = जब कि (अस्य) = इसके आसा मुख से (पयः) = दूध अर्थात् दूध के समान मधुर शब्द (अक्रत) = निष्पन्न किये जाते हैं । यह मधुर ही शब्द बोलता है, 'गोसनिं वाचम् उदेयम्' इस प्रार्थना को यह जीवन में पूर्णतः अनूदित करता है कि गोदुग्ध की तरह मधुर ही वाणी को मैं बोलूँ। जीवन को ऐसा बनाने के उद्देश्य से ही (सचेतसः) = समझदार लोग (अत्र) = इस मानव जीवन में (स्वम्) = आत्मा को अर्थात् आत्मभूत इस परमात्मतत्त्व को (अभ्यर्चन्ति) = दिन-रात पूजित करते हैं। सदा उस प्रभु का स्मरण करते हैं। यह प्रभुस्मरण ही उनके जीवनों को मधुर बनाये रखता है। प्रभु का उपासक सब प्राणियों में समवस्थित उस प्रभु का दर्शन करता है और सभी के प्रति प्रेम वाला होता है । इसे सब के साथ बन्धुत्व का अनुभव होता है, और यह एकत्व दर्शन ही इसे घृणा से ऊपर उठाकर प्रेमपूर्ण कर देता है। =
भावार्थभाषाः - भावार्थ - हम व्यापक उन्नति करनेवाले हों, विद्वान् व विकसित शक्तियों वाले होकर प्रभुरूप तृतीय धाम में विचरें। हमारे मुख से दुग्धसम मधुर शब्द निकलें और हम समझदार बनकर प्रभु का पूजन करनेवाले हों। प्रभु पूजन को छोड़ प्रकृति में आसक्त हो जाना ही मूर्खता है ।