पदार्थान्वयभाषाः - [१] (स) = वह गतमन्त्र की सात बातों को अपनानेवाला तू (जातः) = शक्तियों के विकास वाला हुआ है, तू अपने में (रोदस्योः) = द्यावापृथिवी का, मस्तिष्क व शरीर का (गर्भ:) = [Joining, union] जोड़नेवाला (असि) = है, तू ने शरीर व मस्तिष्क दोनों की शक्ति का विकास किया है। केवल शरीर व केवल मस्तिष्क का विकास जीव के अधूरेपन का कारण होता है। केवल पृथिवी व केवल आकाश संसार को पूर्ण नहीं बनाता। इसी प्रकार वैयक्तिक जीवन की पूर्ति के लिये शरीर व मस्तिष्क दोनों के विकास को संगम करना आवश्यक है। अन्यथा हम राक्षस व ब्रह्म राक्षस ही बन जाते हैं। इस द्विविध विकास को जोड़नेवाले 'त्रित' से प्रभु कहते हैं कि ('अग्ने') = हे उन्नति करनेवाले जीव ! (चारुः) = शरीर व मस्तिष्क को उन्नति को अपने में संगत करके तू बड़े सुन्दर जीवन वाला हुआ है। इस सुन्दर जीवन का निर्माण तू इसलिये कर पाया है कि (ओषधीषु विभृतः) = ओषधि वनस्पतियों पर ही तेरा पालन-पोषण हुआ है। तेरा भोजन वानस्पतिक ही रहा है - 'व्रीहि, यव, माष व तिल' आदि का ही तूने प्रयोग किया है, मांस भोजन ने तेरे मन को क्रूर व राजस नहीं बना दिया। ओषधि - भोजन से तेरे सब दोषों का दहन [उष दाहे] हुआ है इसीलिये तू (चित्र:) = [चित् ज्ञाने] ज्ञान का ग्रहण करनेवाला बना है। 'शिशुः' [ शो तनूकरणे] = तूने अपनी बुद्धि को बड़ा सूक्ष्म बनाया है तथा (परि तमांसि) = अन्धकारों का तू वर्जन करनेवाला हुआ है [ परेर्वर्जने] और (मातृभ्यः) = तेरे जीवन का निर्माण करनेवाले 'माता-पिता व आचार्यों' से तू (अक्तून्) = ज्ञान की किरणों को (अधिकनिक्रदत्) = आधिक्येन गर्जना करता हुआ (प्रगाः) = प्राप्त हुआ है। उनसे समय-समय पर जिन ज्ञान की वाणियों को तूने सुना, उन्हें बारम्बार उच्चारण करते हुए [अधिकनिक्रदत्] तूने स्मरण कर लिया और इस प्रकार इन्हें अपने जीवन का अंग बना लिया। भोजन,
भावार्थभाषाः - भावार्थ- 'विकास, शरीर व मस्तिष्क का संगम, जीवन सौन्दर्य, वानस्पतिक ज्ञानग्रहण, बुद्धि की सूक्ष्मता, अन्धकार निरसन, ज्ञानवाणियों का जप व स्मरण' इन बातों को अपनाने से हमारा जीवन सफल होता है।