अप॑ न॒: शोशु॑चद॒घमग्ने॑ शुशु॒ग्ध्या र॒यिम्। अप॑ न॒: शोशु॑चद॒घम् ॥
apa naḥ śośucad agham agne śuśugdhy ā rayim | apa naḥ śośucad agham ||
अप॑। नः॒। शोशु॑चत्। अ॒घम्। अग्ने॑। शु॒शु॒ग्धि। आ। र॒यिम्। अप॑। नः॒। शोशु॑चत्। अ॒घम् ॥ १.९७.१
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अब आठ ऋचावाले सत्तानवें सूक्त का प्रारम्भ है। उसके प्रथम मन्त्र में सभाध्यक्ष कैसा हो, यह उपदेश किया है ।
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
पवित्र धन
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अथायं सभाध्यक्षः कीदृश इत्युपदिश्यते ।
हे अग्ने भवान् नोऽस्माकमघमपशोशुचत्पुनः पुनर्दूरीकुर्य्यात्। रयिमाशुशुग्धि। नोऽस्माकमघमपशोशुचत् ॥ १ ॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
How should Agni (President of the Assembly) be is taught in the first Mantra.
O Agni-our leader-President of the Assembly ! Remove our sin, disease and laziness. Purify our riches of all kinds. Remove or cast aside all sin done with mind, speech and body.
माता सविता जोशी
(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)या सूक्तात सभाध्यक्ष, अग्नी व ईश्वर यांच्या गुणांचे वर्णन असून, या सूक्ताच्या अर्थाची मागच्या सूक्ताच्या अर्थाबरोबर संगती जाणली पाहिजे.
