त्वं च॑ सोम नो॒ वशो॑ जी॒वातुं॒ न म॑रामहे। प्रि॒यस्तो॑त्रो॒ वन॒स्पति॑: ॥
tvaṁ ca soma no vaśo jīvātuṁ na marāmahe | priyastotro vanaspatiḥ ||
त्वम्। च॒। सो॒म॒। नः॒। वशः॑। जी॒वातु॑म्। न। म॒रा॒म॒हे॒। प्रि॒यऽस्तो॑त्रः। वन॒स्पतिः॑ ॥ १.९१.६
स्वामी दयानन्द सरस्वती
फिर वह कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ।
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
प्रभुरक्षा में मृत्यु कहाँ ?
स्वामी दयानन्द सरस्वती
पुनः स कीदृश इत्युपदिश्यते ।
हे सोम यतस्त्वमयं च नोऽस्माकं जीवातुं वशः प्रियस्तोत्रो वनस्पतिर्भवसि भवति वा तदेतद् द्वयं विज्ञाय वयं सद्यो न मरामहे ॥ ६ ॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
How is Soma is taught further in the 6th. Mantra.
O Gon-Inspirer of good acts, Thou givest us power to us as Thou control ourselves. Thy glorification is dear to art the lord of all objects. knowing Thee O Lord and the Soma plant which is admirable and giver of vitality, may we not die prematurely.
