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देवता: सोमः ऋषि: गोतमो राहूगणः छन्द: गायत्री स्वर: षड्जः

इ॒मं य॒ज्ञमि॒दं वचो॑ जुजुषा॒ण उ॒पाग॑हि। सोम॒ त्वं नो॑ वृ॒धे भ॑व ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

imaṁ yajñam idaṁ vaco jujuṣāṇa upāgahi | soma tvaṁ no vṛdhe bhava ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

इ॒मम्। य॒ज्ञम्। इ॒दम्। वचः॑। जु॒जु॒षा॒णः। उ॒प॒ऽआग॑हि। सोम॑। त्वम्। नः॒। वृ॒धे। भ॒व॒ ॥ १.९१.१०

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:91» मन्त्र:10 | अष्टक:1» अध्याय:6» वर्ग:20» मन्त्र:5 | मण्डल:1» अनुवाक:14» मन्त्र:10


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर वह क्या करता है, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।

पदार्थान्वयभाषाः - हे (सोम) परमेश्वर वा विद्वन् ! जिससे (इमम्) इस (यज्ञम्) विद्या की रक्षा करनेवाले वा शिल्प कर्मों से सिद्ध किये हुए यज्ञ को तथा (इदम्) इस विद्या और धर्मसंयुक्त (वचः) वचन को (जुजुषाणः) प्रीति से सेवन करते हुए (त्वम्) आप (उपागहि) समीप प्राप्त होते हैं वा यह सोम आदि ओषधिगण समीप प्राप्त होता है (नः) हम लोगों की (वृधे) वृद्धि के लिये (भव) हूजिये वा उक्त ओषधिगण होवें ॥ १० ॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। जब विज्ञान से ईश्वर और सेवा तथा कृतज्ञता से विद्वान्, वैद्यकविद्या वा उत्तम क्रिया से ओषधियाँ मिलती हैं, तब मनुष्यों के सब सुख उत्पन्न होते हैं ॥ १० ॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

यज्ञ व स्तुतिवचन

पदार्थान्वयभाषाः - १. हे (सोम) = शान्त प्रभो ! आप (इमं यज्ञम्) = इस हमसे किये जाते हुए यज्ञ तथा (इदं वचः) = इस स्तुतिवचन को (जुजुषाणः) = प्रीतिपूर्वक सेवन करते हुए (उपागहि) = हमें समीपता से प्राप्त होओ और (त्वम्) = आप (नः) = हमारे (वृधे) = वर्धन के लिए (भव) = होओ । २. प्रभु की प्रीति प्राप्त करने के लिए आवश्यक है कि हम [क] यज्ञशील हों और [ख] स्तुतिवचनों का उच्चारण करनेवाले हों । यह यज्ञशीलता और उपासन हमें प्रभु के समीप प्राप्त कराते हैं । २. यह प्रभु की समीपता हमें निष्पापता व निर्भयता प्राप्त कराके सब प्रकार से वृद्धि को प्राप्त कराती है । पाप से भय का सञ्चार होता है, भय से अशक्ति और अशक्ति से अवनति होती है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ = हम यज्ञशील हों तथा प्रभु के उपासक बनें ताकि जीवन में उन्नति - पथ पर आगे बढ़ सकें ।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनः स किं करोतीत्युपदिश्यते ।

अन्वय:

हे सोम यत इमं यज्ञमिदं वचो जुजुषाणः संस्त्वमुपागहि। उपागच्छति वाऽतो नो वृधे भव भवतु वा ॥ १० ॥

पदार्थान्वयभाषाः - (इमम्) प्रत्यक्षम् (यज्ञम्) विद्यारक्षाकारकं शिल्पसिद्धं वा (इदम्) विद्याधर्मयुक्तम् (वचः) वचनम् (जुजुषाणः) सेवमानः (उपागहि) उपागच्छ उपागच्छति वा (सोम) (त्वम्) (नः) अस्माकम् (वृधे) वृद्धये (भव) भवति वा ॥ १० ॥
भावार्थभाषाः - अत्र श्लेषालङ्कारः। यदा विज्ञानेनेश्वरः सेवाकृतज्ञताभ्यां विद्वांसो वैद्यकसत्क्रियाभ्यामोषधिगणश्चोपागता भवन्ति तदा मनुष्याणां सर्वाणि सुखानि जायन्ते ॥ १० ॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Soma, accept this yajna, this yajnic homage of divine words, come close and be good and kind for our growth and progress.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

What does Soma do is taught in the 10th Mantra.

अन्वय:

(1) O God! Accepting this our Yajna which is the protector of Vidya (Knowledge) or which is accomplished with art and our speech endowed with knowledge and Dharma, come to us) (Let us realise Thy presence with in us) and be our prosperer or augmenter of our wisdom and power.(2) The Mantra is also applicable to a great Scholar of of peaceful disposition who should help in the performance of Yajna in the form of the spread of knowledge and art and augment them in every way.

पदार्थान्वयभाषाः - (यज्ञम्) विद्यारक्षाकारकं शिल्पसिद्ध वा = Yajna that protects Vidya (knowledge) and that is accomplished by art.(इदं वच:) This speech endowed with knowledge and righteousness.
भावार्थभाषाः - There is Shleshalankara used in the Mantra. When God is approached through wisdom. learned persons are approached with service and gratitude and medicinal herbs are known and used through the study of Vaidyaka (Medical science) and their proper application, happiness of all kinds can then be enjoyed by people..
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात श्लेषालंकार आहे. जेव्हा विज्ञानाने ईश्वर मिळतो व सेवा आणि कृतज्ञता यांनी विद्वान मिळतो. वैद्यक विद्या व उत्तम क्रियेद्वारे औषधी मिळतात तेव्हा माणसांना सर्व सुख प्राप्त होते. ॥ १० ॥