वांछित मन्त्र चुनें
828 बार पढ़ा गया

ऋ॒जु॒नी॒ती नो॒ वरु॑णो मि॒त्रो न॑यतु वि॒द्वान्। अ॒र्य॒मा दे॒वैः स॒जोषाः॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ṛjunītī no varuṇo mitro nayatu vidvān | aryamā devaiḥ sajoṣāḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

ऋ॒जु॒ऽनी॒ती। नः॒। वरु॑णः। मि॒त्रः। न॒य॒तु॒। वि॒द्वान्। अ॒र्य॒मा। दे॒वैः। स॒ऽजोषाः॑ ॥

828 बार पढ़ा गया
ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:90» मन्त्र:1 | अष्टक:1» अध्याय:6» वर्ग:17» मन्त्र:1 | मण्डल:1» अनुवाक:14» मन्त्र:1


स्वामी दयानन्द सरस्वती

अब नब्बेवें सूक्त का प्रारम्भ है। उसके प्रथम मन्त्र में फिर वह विद्वान् मनुष्यों में कैसे वर्त्ताव करे, यह उपदेश किया है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - जैसे परमेश्वर धार्मिक मनुष्यों को धर्म प्राप्त कराता है, वैसे (देवैः) दिव्य गुण, कर्म और स्वभाववाले विद्वानों से (सजोषाः) समान प्रीति करनेवाला (वरुणः) श्रेष्ठ गुणों में वर्त्तने (मित्रः) सबका उपकारी और (अर्यमा) न्याय करनेवाला (विद्वान्) धर्मात्मा सज्जन विद्वान् (ऋजुनीती) सीधी नीति से (नः) हम लोगों को धर्मविद्यामार्ग को (नयतु) प्राप्त करावे ॥ १ ॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। परमेश्वर वा आप्त मनुष्य सत्यविद्या के ग्राहक स्वभाववाले पुरुषार्थी मनुष्य को उत्तम धर्म और उत्तम क्रियाओं को प्राप्त कराता है, और को नहीं ॥ १ ॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

वरुण - मित्र - अर्यमा [जीवन के तीन सिद्धान्त]

पदार्थान्वयभाषाः - १. (नः) = हमें (विद्वान्) = ज्ञानी (वरुणः) = अपने हृदय से द्वेष का निवारण करनेवाला श्रेष्ठ व्यक्ति (ऋजुनीती) = [नीत्या] सरल मार्ग से (नयतु) = ले - चले । हम ज्ञानी बनकर द्वेष की व्यर्थता को समझें, इसकी घातकता को समझते हुए हम द्वेष को त्यागें और श्रेष्ठ बनें । २. इसी प्रकार (विद्वान्) = ज्ञानी (मित्रः) = अपने को पापों से बचानेवाला [प्रमीतेः , त्रायते] सबके प्रति स्नेह करनेवाला [मिद् स्नेहने] प्रभुप्रिय व्यक्ति हमें सरल मार्ग से ले - चले । ईर्ष्या - द्वेष, क्रोध का मार्ग कुटिलता का मार्ग है । इस मार्ग से हम बचकर चलें । श्रेय का मार्ग ही निष्पाप है । यही मार्ग छल - छिद्र से रहित व सरल है । ३. (देवैः सजोषा) = सब दिव्य गुणों के साथ समानरूप से प्रीतिवाला - सम्पूर्ण दैवीसम्पत्ति को अपने में धारण करनेवाला (अर्यमा) = [अरीन् यच्छति] काम - क्रोध व लोभ का नियमन करनेवाला (विद्वान्) = ज्ञानी पुरुष हमें सरल मार्ग से ले - चले । देवता सरल मार्ग से ही चलते हैं । कुटिलता व छल - छिद्र आसुरीवृत्ति है । कामादि पर विजय पाकर हम सरल मार्ग को ही अपनाएँ ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ = सरल जीवन के तीन सिद्धान्त हैं - [क] द्वेष न करना - 'वरुण' [ख] सबके प्रति स्नेह से वर्तना - 'मित्र' और [ग] काम - क्रोध - लोभ का नियमन करना - अर्यमा' ।

स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनः स विद्वान् मनुष्येषु कथं वर्त्तेतेत्युपदिश्यते।

अन्वय:

यथेश्वरो धार्मिकमनुष्यान् धर्म्मं नयति, तथा देवैः सजोषा वरुणो मित्रोऽर्य्यमा विद्वानृजुनीती नोऽस्मान् धर्मविद्यामार्गं नयतु ॥ १ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - (ऋजुनीती) ऋजुः सरला शुद्धा चासौ नीतिश्च तया। अत्र सुपां सुलुगिति तृतीयायाः पूर्वसवर्णादेशः। (नः) अस्मान् (वरुणः) श्रेष्ठगुणस्वभावः (मित्रः) सर्वोपकारी (नयतु) प्रापयतु (विद्वान्) अनन्तविद्य ईश्वर आप्तमनुष्यो वा (अर्य्यमा) न्यायकारी (देवैः) दिव्यैर्गुणकर्मस्वभावैर्विद्वद्भिर्वा (सजोषाः) समानप्रीतिसेवी ॥ १ ॥
भावार्थभाषाः - अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। परमेश्वर आप्तमनुष्यो वा सत्यविद्याग्रहणस्वभावपुरुषार्थिनं मनुष्यमनुत्तमे धर्मक्रिये च प्रापयति नेतरम् ॥ १ ॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - May God, Lord Omniscient, Varuna, lord of justice and worthy of our intelligent choice, Mitra, lord of universal friendship, and the man of knowledge, wisdom and divine vision bless us with a natural simple and honest way of living. May Aryama, lord of justice and dispensation, bless us with a straight way of living without pretence. May He, lord of love who loves us and whom we love bless us with the company of noble, generous and brilliant people in humanity, and may He grant us the benefit of such generous powers of nature.

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

How should a learned person deal with men is taught in the first Mantra.

अन्वय:

As God leads righteous persons towards the path of Dharma (righteousness and duty) in the same manner, may a man of surpassing excellence, a man friendly to all, a just person, learned men lead us towards the path of Dharma (righteousness) and knowledge, following a straight forward or upright and pure policy. along with other enlightened and truthful persons.

पदार्थान्वयभाषाः - (सजोषाः) समानप्रीतिसेवी = Loving and united. (जुषी-प्रीतिसेवनयोः) (देवै:) दिव्यैर्गुणकर्मस्वभावविद्वद्भिर्वा = With divine merits and actions or with enlightened persons.
भावार्थभाषाः - It is God or His devotee absolutely truthful person that lead an industrious and seeker after wisdom and knowledge, towards righteousness and noble acts.

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)

या सूक्तात अध्ययन अध्यापन करणाऱ्यांचे व ईश्वराचे कर्तव्य, काम व त्याचे फळ सांगितलेले आहे. यामुळे या सूक्ताच्या अर्थाबरोबर मागच्या सूक्ताच्या अर्थाची संगती जाणली पाहिजे. ॥

भावार्थभाषाः - या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. परमेश्वर किंवा आप्त माणूस सत्यविद्या ग्रहण करण्याचा स्वभाव असणाऱ्या पुरुषार्थी माणसाला उत्तम धर्म व उत्तम क्रिया प्राप्त करवून देतो, इतरांना नाही. ॥ १ ॥