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ए॒तत्त्यन्न योज॑नमचेति स॒स्वर्ह॒ यन्म॑रुतो॒ गोत॑मो वः। पश्य॒न्हिर॑ण्यचक्रा॒नयो॑दंष्ट्रान्वि॒धाव॑तो व॒राहू॑न् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

etat tyan na yojanam aceti sasvar ha yan maruto gotamo vaḥ | paśyan hiraṇyacakrān ayodaṁṣṭrān vidhāvato varāhūn ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

ए॒तत्। त्यत्। न। योज॑नम्। अ॒चे॒ति॒। स॒स्वः। ह॒। यत्। म॒रु॒तः॒। गोत॑मः। वः॒। पश्य॑न्। हिर॑ण्यऽचक्रान्। अयः॑ऽदंष्ट्रान्। वि॒ऽधाव॑तः। व॒राहू॑न् ॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:88» मन्त्र:5 | अष्टक:1» अध्याय:6» वर्ग:14» मन्त्र:5 | मण्डल:1» अनुवाक:14» मन्त्र:5


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

विद्वान् मनुष्यों को क्या-क्या शिक्षा दे, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे (मरुतः) मनुष्यो ! तुम (गोतमः) विद्वान् के (न) तुल्य (वः) विद्या का ज्ञान चाहनेवाले तुम लोगों को (यत्) जो (योजनम्) जोड़ने योग्य विमान आदि यान (हिरण्यचक्रान्) जिनके पहियों में सोने का काम वा अति चमक दमक हो, उन (अयोदंष्ट्रान्) बड़ी लोहे की कीलोंवाले (वराहून्) अच्छे शब्दों को करने (विधावतः) न्यारे-न्यारे मार्गों को चलनेवाले विमान आदि रथों को (एतत्) प्रत्यक्ष (पश्यन्) देख के (ह) ही (सस्वः) उपदेश करता है, (त्यत्) वह उसका उपदेश किया हुआ तुम लोगों को (अचेति) चेत करता है, उसको तुम जान के मानो ॥ ५ ॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जैसे अगली-पिछली बातों को जाननेवाला विद्वान् अच्छे-अच्छे काम कर आनन्द को भोगता है, वैसे आप लोग भी विद्या से सिद्ध हुए कामों को करके सुखों को भोगो ॥ ५ ॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

गोतम व मरुतों का भोजन

पदार्थान्वयभाषाः - १. हे (मरुतः) = प्राणो ! (गोतमः) = यह प्रशस्तेन्द्रिय पुरुष (यत्) = जो (वः) = तुम (हिरण्यचक्रान्) = हितरमणीय क्रियावालों को [स्वर्ण के चक्रवालों को], (अयोदंष्ट्रान्) = लोहे के दाँतोंवालों को जिनके दाँत अत्यन्त दृढ़ हैं उनको, (विधावतः) = विविध दिशाओं में दौड़ते हुओं को अथवा जीवन को शुद्ध बनाते हुओं को [धावु गतिशुद्ध्योः] वस्तुतः गति के द्वारा जीवन का शोधन करते हुओं को तथा (वराहून्) = [वरस्य हविषो भक्षयितॄन् - सा०] उत्कृष्ट हव्य पदार्थों का सेवन करनेवालों को (पश्यन्) = देखता हुआ (ह) = निश्चय से (सस्वः) = स्तुति का उच्चारण करता है । (एतत्) = यह (त्यत्) = वह ही (योजनं न) = मेल = सा (अचेति) = जाना जाता है । गोतम का मरुतों से मेल यही है कि वह इन मरुतों का स्तवन करता है । २. स्तवन करते हुए वह कहता है कि हे प्राणो ! आप [क] "हिरण्यचक्र" हो - हितरमणीय क्रियाओंवाले हो । प्राणसाधक पुरुष की चित्तवृत्ति की पवित्रता के कारण क्रियाएँ भी पवित्र होती हैं, [ख] ये प्राण 'अयोदंष्ट्र' हैं—प्राणसाधक के दाँत भी लोहे के समान दृढ़ बने रहते हैं, [ग] ये प्राण "विधावन्" हैं, विविध गतियों के द्वारा जीवन को शुद्ध बनाये रखनेवाले हैं, [घ] गोतम इन्हें 'वराहु' रूप से स्मरण करता है, क्योंकि ये पवित्र हव्य पदार्थों का ही सेवन करनेवाले हैं । प्राणसाधक को राजस् व तामस् भोजन से ऊपर उठना चाहिए । भोजन के विषय में संयमी ही योग का लाभ प्राप्त कर सकता है । मन्त्र का ऋषि 'गोतम' प्राणों के महत्त्व का वर्णन करता है और प्राणसाधना करता हुआ इनके द्वारा प्रभु को मिलने के लिए यत्नशील होता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ = प्राणसाधक पुरुष हितरमणीय कार्यों में ही प्रवृत्त होता है, दृढ़ दाँतोंवाला होता है, क्रियामय व शुद्ध जीवनवाला होता है और इसे सात्विक भोजन ही रुचिकर होता है ।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

विद्वान् मनुष्यान् प्रति किं किं शिक्षेतेत्युपदिश्यते ॥

अन्वय:

हे मरुतो ! यूयं यद्यो गोतमो न वो योजनं हिरण्यचक्रानयोदंष्ट्रान् वराहून् विधावतो रथानेतत्पश्यन् ह सस्वस्त्यदचेति तं विज्ञाय सत्कुरुत ॥ ५ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - (एतत्) प्रत्यक्षम् (त्यत्) उक्तम् (न) इव (योजनम्) योक्तुमर्हं विमानादियानम् (अचेति) संज्ञाप्यते। चिती संज्ञाने। लुङि कर्मणि चिण्। (सस्वः) उपदिशति। स्वृधातोर्लङि प्रथमपुरुषैकवचने बहुलं छन्दसीति शपःस्थाने श्लुः। हल्ङ्याब्भ्य इति तलोपः। (ह) खलु (यत्) (मरुतः) मनुष्याः (गोतमः) विद्वान् (वः) युष्मभ्यं जिज्ञासुभ्यः (पश्यन्) पर्य्यालोचमानः (हिरण्यचक्रान्) हिरण्यानि सुवर्णादीनि तेजांसि चक्रेषु येषां विमानादीनां तान् (अयोदंष्ट्रान्) अयोदंष्ट्रायो दंसनानि येषु तान् (विधावतः) विविधान् मार्गान् धावतः (वराहून्) वरमाह्वयतः शब्दायमानान् ॥ ५ ॥
भावार्थभाषाः - अत्रोपमालङ्कारः हे मनुष्या ! यथा परावरज्ञो विद्वान् सुक्रियाः कृत्वाऽऽनन्दं भुङ्क्ते, तथैव भवन्तोऽपि विद्वत्सङ्गेन विद्यासिद्धाः क्रियाः कृत्वा सुखानि भुञ्जीरन् ॥ ५ ॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Maruts, heroes of knowledge and action moving at the speed of winds, this order of knowledge, action, science and progress which the scholars of science and Divinity, seeing the chariots of golden wheels and jaws of steel flying around and roaring, describes and teaches like an ideal teacher, awakens you to higher consciousness of knowledge and responsibility.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

What should a learned person teach men is taught in the fifth Mantra.

अन्वय:

O men, As a learned person tells you about an aeroplane seeing many chariots with golden wheels, with some tusks or parts of iron which are teeth-like, making good sound and rushing about, so it is known well.

पदार्थान्वयभाषाः - (योजनम्) योक्तुमर्हविमानादिकम् = Aeroplane and other vehicles which should be constructed. (सस्व:) उपदिशति = Tells or teaches. स्वृ-शब्दोपतापयो: इति धातोर्लङि बहुलं छन्दसीति शप: स्थानेश्लु: हलङ्याभ्य इतितलोपः (वराहून् ) वरम् आह्वयतः शब्दायमानान् (गोतम:) विद्वान्।
भावार्थभाषाः - As a great scholar enjoys, having done noble deeds, in the same manner, you should also enjoy happiness and delight by acquiring the knowledge of various sciences and accomplishing thereby application with the association of the learned.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात उपमालंकार आहे. हे माणसांनो! भूतकाळ व भविष्यकाळातील गोष्टी जाणणारा विद्वान चांगले कर्म करून आनंद भोगतो तसे तुम्हीही विद्येने सिद्ध झालेले कर्म करून सुख भोगा. ॥ ५ ॥