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श्रि॒ये कं वो॒ अधि॑ त॒नूषु॒ वाशी॑र्मे॒धा वना॒ न कृ॑णवन्त ऊ॒र्ध्वा। यु॒ष्मभ्यं॒ कं म॑रुतः सुजातास्तुविद्यु॒म्नासो॑ धनयन्ते॒ अद्रि॑म् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

śriye kaṁ vo adhi tanūṣu vāśīr medhā vanā na kṛṇavanta ūrdhvā | yuṣmabhyaṁ kam marutaḥ sujātās tuvidyumnāso dhanayante adrim ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

श्रि॒ये। कम्। वः॒। अधि॑। त॒नूषु॑। वाशीः॑। मे॒धा। वना॑। न। कृ॒ण॒व॒न्ते॒। ऊ॒र्ध्वा। यु॒ष्मभ्य॑म्। कम्। म॒रु॒तः॒। सु॒ऽजा॒ताः॒। तु॒वि॒ऽद्यु॒म्नासः॑। ध॒न॒य॒न्ते॒। अद्रि॑म् ॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:88» मन्त्र:3 | अष्टक:1» अध्याय:6» वर्ग:14» मन्त्र:3 | मण्डल:1» अनुवाक:14» मन्त्र:3


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

अब सभाध्यक्षादिकों को उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे (मरुतः) सभाध्यक्षादि सज्जनो ! जो (वः) तुम्हारे (तनूषु) शरीरों में (श्रिये) लक्ष्मी के लिये (कम्) सुख (ऊर्ध्वा) अच्छे सुख को प्राप्त करनेवाली (वाशीः) वेदवाणी (मेधा) शुद्ध बुद्धियों को (वना) ऊँचे-ऊँचे बनैले पेड़ों के (न) समान (अधि कृणवन्ते) अधिकृत करते हैं अर्थात् उनके आचरण के लिये अधिकार देते हैं। हे (सुजाताः) विद्यादि श्रेष्ठ गुणों में प्रसिद्ध उक्त सज्जनो ! जो (तुविद्युम्नासः) बहुत विद्या प्रकाशोंवाले महात्मा जन (युष्मभ्यम्) तुम लोगों के लिये (कम्) अत्यन्त सुख जैसे हो वैसे (अद्रिम्) पर्वत के समान (धनयन्ते) बहुत धन प्रकाशित कराते हैं, वे तुम लोगों को सदा सेवने योग्य हैं ॥ ३ ॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे मेघ वा कूप जल से सिंचे हुए वन और उपवन, बाग-बगीचे अपने फलों से प्राणियों को सुखी करते हैं, वैसे विद्वान् लोग विद्या और अच्छी शिक्षा करके अपने परिश्रम के फल से सब मनुष्यों को सुखसंयुक्त करते हैं ॥ ३ ॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

प्रभुरूप ध

पदार्थान्वयभाषाः - १. हे जीवो ! (मरुतः) = प्राण (वः श्रिये) = तुम्हारी शोभा के लिए (कम्) = आनन्दमय प्रभु को (कृण्वन्त) = प्राप्त कराते हैं । प्राणसाधना से चित्तवृत्ति का निरोध होकर जब यह निरुद्ध चित्तवृत्ति प्रभु की ओर झुकती है = उस समय मनुष्य एक अवर्णनीय आनन्द का अनुभव करता है । २. ये प्राण (वः तनूषु) = तुम्हारे शरीरों में (वाशीः) ज्ञान की वाणियों को (मेधा) = धारणवती बुद्धि को (न) = [च] और (वना) = [वन संभक्तौ] उपासनाओं को (ऊर्ध्वा) = उन्नत (कृण्वन्त) = करते हैं । प्राणसाधना के द्वारा बुद्धि सूक्ष्म होती है [मेधा], मनुष्य ज्ञान की वाणियों को ग्रहण करनेवाला होता है [वाशीः] और उसकी चितवृत्ति उपासनाप्रवण होती है [वना] । ३. हे मनुष्यो ! (सुजाताः) = उत्तम विकासवाले, (तुविद्युम्नासः) = [घुम्न splendour, energy] महान् ज्योति व शक्तिवाले (मरुतः) = प्राण (कम्) = आनन्दमय (अद्रिम्) = [आदरणीय, निरु०९/८] आदरणीय प्रभु को (धनयन्ते) = [धनं कुर्वन्ति] धन बनाते हैं । प्राणसाधना से सब शक्तियों का विकास होता है, ज्ञानज्योति व शक्ति बढ़ती हैं । चित्तवृत्ति की एकाग्रता के द्वारा आनन्दमय प्रभु का दर्शन होने से प्रभु ही महान् धन प्रतीत होने लगते हैं । उस प्रभुरूप धन की तुलना में ये भौतिक धन अत्यन्त तुच्छ हो जाते हैं । न
भावार्थभाषाः - भावार्थ = प्राणसाधना से शोभा बढ़ती है, बुद्धि व उपासनावृत्ति का विकास होता है प्रभु ही इष्ट धन हो जाते हैं ।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

अथ सभाध्यक्षाद्युपदेशमाह ॥

अन्वय:

हे मरुतो ! ये वस्तनूषूर्ध्वा वाशीर्मेधा वना नोच्छ्रितवनवृक्षसमूहानि वाधिकृणवन्ते तदाचरणायाधिकारं ददति। हे सुजातास्तुविद्युम्नासो महान्तो ! युष्मभ्यं कं यथा स्यात् तथाद्रिं धनयन्ते पर्वतसदृशं महान्तं धनं कुर्वन्ति ते युष्माभिः सदा सेवनीयाः ॥ ३ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - (श्रिये) विद्याराज्यशोभाप्राप्तये (कम्) सुखम् (वः) युष्माकम् (अधि) आधेयत्वे (तनूषु) शरीरेषु (वाशीः) वेदविद्यायुक्ता वाणीः (मेधा) पवित्रकारिका प्रज्ञा। केचिद् भ्रान्ताः ‘मेधा’ इत्यत्र ‘मेध्या’ इति पदमाश्रित्याद्युदात्तेन मेध्यपदार्थायै तत्पदमिच्छन्ति। तच्चासमञ्जसमेव। कुतः? ‘मेधा’ इत्यन्तोदात्तस्य दर्शनात्। भट्टमोक्षमूलरोऽपि ‘मेधा’ इति सविसर्गं पदं मत्वा बुद्धिपदार्थायैनत् पदं विवृणोति तच्चाप्यसमञ्जसमेव। कुतः? ‘मेधा’ इति निर्विसर्जनीयस्य पदस्य जागरूकत्वात्। (वना) वनानि (न) इव (कृणवन्ते) कुर्वन्ति। व्यत्ययेनात्रात्मनेपदम्। (ऊर्ध्वा) उत्कृष्टसुखप्रापिकाः (युष्मभ्यम्) (कम्) कल्याणम् (मरुतः) (सुजाताः) शोभनेषु विद्यादिगुणेषु प्रसिद्धाः (तुविद्युम्नासः) तुवीनि बहूनि द्युम्नानि विद्याप्रकाशनानि येषान्ते (धनयन्ते) धनं कुर्वन्ति (अद्रिम्) पर्वतमिव ॥ ३ ॥
भावार्थभाषाः - अत्रोपमालङ्कारः। यथा मेघेन कूपोदकेन वा सिक्ताः वनान्युपवनानि वा निजफलैः प्राणिनः सुखयन्ति, तथैव विद्वांसो विद्यासुशिक्षा जनयित्वा निजपरिश्रमफलेन सर्वान् मनुष्यान् सुखयन्तीति ॥ ३ ॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - For the grace of beauty, freedom and power, and to provide you comfort, they raise the level of intelligence and knowledge of the divine Word of the Veda in your personality just as they raise and develop the trees of the forest. The Maruts, high born, abundant and exuberant in the wealth and knowledge of nature and mind, enrich the cloud and the mountain to bear fruit and provide comfort and joy for you.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The duties of the President of the Assembly and others are taught in the third Mantra.

अन्वय:

O Maruts (President of the Assembly and other workers of the State) you should always serve those learned persons who establish noble Vedic speech in your tongue (a part of the body) endow you with purifying intellect for the attainment of knowledge, happiness, Government and beauty like tall trees of the forest. O Maruts, shining with the knowledge and great, famous for your learning and other virtues, men collect. for you huge wealth like the mountains. You should also bring about their welfare.

पदार्थान्वयभाषाः - (वाशी:) वेदविद्यायुक्ता वाणी: = Speech endowed with the Vedic knowledge. = (मेधा ) पवित्रकारिका प्रज्ञा = Purifying intellect. (सुजातास:) शोभनेषु विद्यादिगुणेषु प्रसिद्धाः = Famous on account of knowledge and other virtues. = (तुविद्युम्ना:) तृवीनि बहूनि द्युम्नानि विद्याप्रकाशनानि येषां ते = Shining with the light of knowledge.
भावार्थभाषाः - As the trees in the forest or orchards when watered by the wells or clouds make people happy by their fruits, in the Same way, learned persons gladden all by their labour, vast knowledge and good education.
टिप्पणी: वाशीति वाङ्नाम (निघ० १.११ ) Rishi Dayananda Sarasvati's interpretation of वाशी:(Vasheeh) as वेद विद्यायुक्ता वाचः is clearly borne out by the Vedic Lexicon (Nighantu 1.10) saying वाशीतिवाङ नाम (निघ० १.११)
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात उपमालंकार आहे. जसे मेघ किंवा कूप जलाने सिंचित झालेली वने, उपवने, बागबगीचे आपल्या फळांनी प्राण्यांना सुखी करतात तसे विद्वान लोक विद्या व चांगले शिक्षण घेऊन परिश्रमपूर्वक सर्व माणसांना सुखी करतात. ॥ ३ ॥