वांछित मन्त्र चुनें
देवता: मरुतः ऋषि: गोतमो राहूगणः छन्द: गायत्री स्वर: षड्जः

अ॒स्य वी॒रस्य॑ ब॒र्हिषि॑ सु॒तः सोमो॒ दिवि॑ष्टिषु। उ॒क्थं मद॑श्च शस्यते ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

asya vīrasya barhiṣi sutaḥ somo diviṣṭiṣu | uktham madaś ca śasyate ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अ॒स्य। वी॒रस्य॑। ब॒र्हिषि॑। सु॒तः। सोमः॑। दिवि॑ष्टिषु। उ॒क्थम्। मदः॑। च॒। श॒स्य॒ते॒ ॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:86» मन्त्र:4 | अष्टक:1» अध्याय:6» वर्ग:11» मन्त्र:4 | मण्डल:1» अनुवाक:14» मन्त्र:4


0 बार पढ़ा गया

स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर उन शिक्षित मनुष्यों से क्या होता है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे विद्वानो ! आपके सुशिक्षित (अस्य) इस (वीरस्य) वीर का (सुतः) सिद्ध किया हुआ (सोमः) ऐश्वर्य (दिविष्टिषु) उत्तम इष्टिरूप कर्मों से सुखयुक्त व्यवहारों में (उक्थम्) प्रशंसित वचन (बर्हिषि) उत्तम व्यवहार के करने में (मदः) आनन्द (च) और सद्विद्यादि गुणों का समूह (शस्यते) प्रशंसित होता है, अन्य का नहीं ॥ ४ ॥
भावार्थभाषाः - विद्वानों की शिक्षा के विना मनुष्यों में उत्तम गुण उत्पन्न नहीं होते। इससे इसका अनुष्ठान नित्य करना चाहिये ॥ ४ ॥
0 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

स्तवन व आनन्द

पदार्थान्वयभाषाः - १. (अस्य वीरस्य) = प्राणसाधना के द्वारा वीर बने हुए इस पुरुष के (बर्हिषि) = यज्ञों के होने पर तथा (दिविष्टिषु) = [दिव एषणेषु = निरु० ६/२२] ज्ञान की एषणाओं में - ज्ञानप्राप्ति की कामनाओं में (सोमः सुतः) = सोम का सम्पादन होता है । जब मनुष्य कर्मेन्द्रियों से यज्ञादि उत्तम कर्मों में लगा रहता है और ज्ञानेन्द्रियों से ज्ञानप्राप्ति की कामनावाला बना रहता है तब वह वासनाओं का शिकार नहीं होता । बस, वासनाओं से आक्रान्त न होना ही सोम के सम्पादन का साधन है । वासना सोम = वीर्य की विनाशक है । २. सोम का रक्षण होने पर इस वीर पुरुष के जीवन में (उक्थम्) = स्तोत्र - प्रभुस्तवन चलता है (च) = और (मदः) = आनन्द का अनुभव होता है । इस वीर के जीवन की ये दो ही बातें (शस्यते) = प्रशंसनीय होती हैं । प्रभुस्तवन व आनन्दमय मन इसके जीवन को स्तुत्य बनानेवाले होते हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ = वीर पुरुष कर्मेन्द्रियों को यज्ञों में और ज्ञानेन्द्रियों को ज्ञानप्राप्ति में लगाता है । इस प्रकार सोम का रक्षण करता हुआ स्तवन व आनन्दमय मन से जीवन को प्रशस्त करता है ।
0 बार पढ़ा गया

स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनस्तै शिक्षितैः किं जायत इत्युपदिश्यते ॥

अन्वय:

हे विद्वांसो ! भवच्छिक्षितस्यास्य वीरस्य सुतः सोमो दिविष्टिषूक्थं बर्हिषि मदो गुणसमूहश्च शक्यते नेतरस्य ॥ ४ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - (अस्य) (वीरस्य) विज्ञानशौर्य्यनिर्भयाद्युपेतस्य (बर्हिषि) उत्तमे व्यवहारे कृते सति (सुतः) निष्पन्नः (सोमः) ऐश्वर्यसमूहः (दिविष्टिषु) दिव्या इष्टयः सङ्गतानि कर्माणि सुखानि वा येषु व्यवहारेषु तेषु (उक्थम्) शास्त्रप्रवचनम् (मदः) आनन्दः (च) विद्यादयो गुणाः (शस्यते) स्तूयते ॥ ४ ॥
भावार्थभाषाः - विदुषां शिक्षया विना मनुष्येषूत्तमा गुणा न जायन्ते तस्मादेतन्नित्यमनुष्ठेयम् ॥ ४ ॥
0 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - The soma of honour and fame distilled on the holy seats of yajna, the holy chant of praise, and the joy and celebration of the brilliant achievement of this brave young man is exceptional and it is raised all round.
0 बार पढ़ा गया

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

What is the result of such training is taught further in the fourth Mantra

अन्वय:

O learned persons! Of the hero who is trained by you, the wealth earned by him righteously, the study and teaching of the Shastras, the joy experienced by him when he does noble deeds in delightening dealings, his deep knowledge and other virtues are praised and sung by all and not of ignoble men.

पदार्थान्वयभाषाः - (बर्हिषि) उत्तमे व्यवहारे कृते सति = On behaving nobly. (दिविष्टिषु) दिव्याः इष्टय:-संगतानिकर्माणि वा येषु व्यवहारेषु तेषु । = In delightening dealings.
भावार्थभाषाः - It is not possible to acquire or cultivate good virtues among men without the education received from learned persons; therefore such education must be received by all.
टिप्पणी: बर्हिषि इति महन्नाम (निघ० ३.३) So it has been interpreted by Rishi Dayananda as उत्तमे व्यवहारे यज-देवपूजासंगतिकरजदानेषु अन्न संगतिकरणार्थस्य ग्रहणम् ।
0 बार पढ़ा गया

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - विद्वानांनी दिलेल्या शिक्षणाशिवाय माणसांमध्ये उत्तम गुण उत्पन्न होत नाहीत. त्यामुळे त्याचे अनुष्ठान नित्य करावे. ॥ ४ ॥