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वि ये भ्राज॑न्ते॒ सुम॑खास ऋ॒ष्टिभिः॑ प्रच्या॒वय॑न्तो॒ अच्यु॑ता चि॒दोज॑सा। म॒नो॒जुवो॒ यन्म॑रुतो॒ रथे॒ष्वा वृष॑व्रातासः॒ पृष॑ती॒रयु॑ग्ध्वम् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

vi ye bhrājante sumakhāsa ṛṣṭibhiḥ pracyāvayanto acyutā cid ojasā | manojuvo yan maruto ratheṣv ā vṛṣavrātāsaḥ pṛṣatīr ayugdhvam ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

वि। ये। भ्राज॑न्ते। सुऽम॑खासः। ऋ॒ष्टिऽभिः॑। प्र॒ऽच्या॒वय॑न्तः। अच्यु॑ता। चि॒त्। ओज॑सा। म॒नः॒ऽजुवः॑। यत्। म॒रु॒तः॒। रथे॑षु। आ। वृष॑ऽव्रातासः। पृष॑तीः। अयु॑ग्ध्वम् ॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:85» मन्त्र:4 | अष्टक:1» अध्याय:6» वर्ग:9» मन्त्र:4 | मण्डल:1» अनुवाक:14» मन्त्र:4


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर वे क्या-क्या करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे प्रजा और सभा के मनुष्यो ! (ये) जो (मनोजुवः) मन के समान वेगवाले (मरुतः) वायुओं के (चित्) समान (वृषव्रातासः) शस्त्र और अस्त्रों को शत्रुओं के ऊपर वर्षानेवाले मनुष्यों से युक्त (सुमखासः) उत्तम शिल्पविद्या सम्बन्धी वा संग्रामरूप क्रियाओं के करनेहारे (ऋष्टिभिः) यन्त्र कलाओं को चलानेवाले दण्डों और (अच्युता) अक्षय (ओजसा) बल पराक्रम युक्त सेना से शत्रु की सेनाओं को (प्रच्यावयन्तः) नष्ट-भ्रष्ट करते हुए (व्याभ्राजन्ते) अच्छे प्रकार शोभायमान होते हैं, उनके साथ (यत्) जिन (रथेषु) रथों में (पृषतीः) वायु से युक्त जलों को (अयुग्ध्वम्) संयुक्त करो, उनसे शत्रुओं को जीतो ॥ ४ ॥
भावार्थभाषाः - मनुष्यो को उचित है कि मन के समान वेगयुक्त विमानादि यानों में जल, अग्नि और वायु को संयुक्त कर, उसमें बैठ के, सर्वत्र भूगोल में जा-आके शत्रुओं को जीतकर, प्रजा को उत्तम रीति से पाल के, शिल्पविद्या कर्मों को बढ़ा के सबका उपकार किया करें ॥ ४ ॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

अच्युत = च्यावन

पदार्थान्वयभाषाः - १. गतमन्त्र के सैनिकों का ही उल्लेख करते हुए कहते हैं कि (ये) = वे चीर हैं जोकि (सुमखासः) = राष्ट्ररक्षा के लिए युद्ध को उत्तम यज्ञ समझनेवाले हैं, (ऋष्टिभिः) = शत्रुनाशक अस्त्र - शस्त्रों से (विभ्राजन्ते) = विशेषरूप से चमकते हैं और (ओजसा) = ओजस्विता के द्वारा (अच्युता चित्) = अत्यन्त दृढ़ - न हिलाये जाने योग्य पर्वतादि को भी (प्रच्यावयन्तः) मार्ग से हटानेवाले होते हैं । अपनी युद्धयात्रा से पर्वत भी इनको रोक नहीं सकते । २. ये तो (यत्) = चूँकि (मनोजुवः) = [मनोवद् वेगगतयः = सा०] मन के समान वेगयुक्त गतिवाले हैं, अतः (वृषव्रातासः) = शत्रुओं का वर्षण करनेवाले मनुष्य होते हैं [व्राताः = मनुष्याः] । इस प्रकार के ये मरुतः देशरक्षण के लिए मर मिटनेवाले [म्रियन्ते] वीर सैनिक (रथेषु) = रथों में (पृषतीः) = [पृष् to vex, pain, weary] शत्रुओं को व्याकुल कर देनेवाली अपनी घोड़ियों को (आ अयुग्ध्वम्) = समन्तात् जोतते हैं, युद्धयात्रा के लिए तैयार हो जाते हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ = वीर सैनिक आगे बढ़ते हैं, पर्वत भी इन्हें रोक नहीं पाते ।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनस्ते किं किं कुर्य्युरित्युपदिश्यते ॥

अन्वय:

हे प्रजासभामनुष्या ! ये मनोजुवो मरुतश्चिदिव वृषव्रातासः सुमखास ऋष्टिभिरच्युतौजसा शत्रुसैन्यानि प्रच्यावयन्तः सन्तो व्याभ्राजन्ते तैः सह येषु रथेषु यत् पृषतीरयुग्ध्वं तैः शत्रून् विजयध्वम् ॥ ४ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - (वि) विशेषार्थे (ये) सभाद्यध्यक्षादयः (भ्राजन्ते) प्रकाशन्ते (सुमखासः) शोभनाः शिल्पसंबन्धिनः संग्रामा यज्ञा येषान्ते (ऋष्टिभिः) यन्त्रचालनार्थैर्गमनागमननिमित्तैर्दण्डैः (प्रच्यावयन्तः) विमानादीनि यानानि प्रचालयन्तः सन्तः (अच्युता) क्षेतुमशक्येन (चित्) इव (ओजसा) बलयुक्तेन सैन्येन सह वर्त्तमानाः (मनोजुवः) मनोवद्गतयः (यत्) याः (मरुतः) वायवः (रथेषु) विमानादियानेषु (आ) समन्तात् (वृषव्रातासः) वृषाः शस्त्रास्त्रवर्षयितारो व्रातासो मनुष्या येषान्ते (पृषतीः) मरुत्सम्बन्धिनीरपः (अयुग्ध्वम्) योजयत ॥ ४ ॥
भावार्थभाषाः - मनुष्यैर्मनोजवेषु विमानादियानेषु जलाग्निवायून् संप्रयुज्य तत्र स्थित्वा सर्वत्र भूगोले गत्वागत्य शत्रून् विजित्य प्रजाः सम्पाल्य शिल्पविद्याकार्याणि प्रवृध्य सर्वोपकाराः कर्त्तव्याः ॥ ४ ॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - They are the heroes, Maruts, who shine with their own lustre, powers of noble yajnic action and scientific achievement who, moving at the speed of mind, shake even the unshakable with their mighty weapons, using the energy of wind, water and electricity. Ye, rulers and commanders of the forces, powerful tacticians and organisers, deploy the maruts and use the power of versatile wind, water and electricity in your cars and battle chariots.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

What should Maruts do is taught further in the fourth Mantra.

अन्वय:

O men belonging to the general public and the assembly, you should gain victory over the enemies with the help of the Maruts (brave soldiers like the swift winds) who have among them men raining down the missiles and weapons, good performers of the Yajnas in the form of the arts and battles with wicked persons, driving various swift cars like air-planes with suitable sticks and implements shaking by strength or strong invincible army what is un-shakable, i. e. the army of the foes and who shine with their missiles and weapons. They use in their cars swift like the wind, water, fire and other elements.

पदार्थान्वयभाषाः - (ॠष्टिभिः) यन्त्रचालनार्थे: गमनागमन निमित्तैः दण्डैः = By the sticks and other implements used for moving the machines for transportation. (वृषवातासः) वृषा: शस्त्रास्त्रवर्षयितारो व्रातास: मनुष्या येषां ते = Who have men rainers down of weapons and missiles.
भावार्थभाषाः - Men should be engaged in doing benevolent acts by yoking water, fire and wind in their chariots like aeroplanes which are swift like the wind and then sitting in then they should go to distant places and come back after conquering their enemies, protecting their subjects and developing their works of art and industry.
टिप्पणी: व्राता इति मनुष्यनाम (निघ० २.३ ) In his commentary on Rig. 5.54.11 Rishi Dayananda Sarasvati has explained ऋष्टयः as शस्त्रास्त्राणि i.e. weapons and missilles ऋभिः so here also if the word may be taken in that sense besides the above meaning. Prof. Maxmuller's translation of ये भ्राजन्ते ऋष्टिभि as "The powerful who shine with your spears, and of Maruts, the manly hosts shaking even what is un-shakable by strength" (Vedic Hymn Vol. P. 126) proves clearly that by Maruts are meant not "Storm Gods as" supposed by him but brave soldiers as interpreted by Rishi Dayananda Sarasvati.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - माणसांनी मनाप्रमाणे वेगवान विमान इत्यादी यानांमध्ये जल, अग्नी व वायूला संयुक्त करून त्यातून भूगोलात जाणे-येणे करावे व शत्रूंना जिंकून प्रजेचे उत्तम रीतीने पालन करून शिल्पविद्येचे कार्य वृद्धिंगत करून सर्वांवर उपकार करावेत. ॥ ४ ॥