पदार्थान्वयभाषाः - १. (कः) आनन्दमय वह है जोकि (ईषते) = वासनाओं से दूर भागने में [Fly Haway , escape] समर्थ होता है, संसार के तत्त्व को देखता [to look] है, दानशील होता [to give] है, वासनाओं पर प्रबल आक्रमण [to attack] करता है और (तुज्यते) = इन वासनाओं को हिंसित करता है । २. (कः) आनन्दमय वह है जोकि (बिभाय) = प्रभु का भय रखता है, पापकर्म करने से भयभीत होता है । ३. (कः) = आनन्दमय वह है जो (सन्तं इन्द्रं मंसते) = सर्वत्र वर्तमान उस प्रभु को विचारता है और पूजता है । प्रभु हैं तो सर्वत्र, परन्तु प्रभु की इस सर्वव्यापकता का लाभ उसी पुरुष को होता है जो प्रभु की सत्ता में विश्वास करता है । ४. (कः) = आनन्दमय वह है जो उस प्रभु को (अन्ति) = अपने समीप जानता है । प्रभु को समीपता में उसे सांसारिक भय नहीं रहते । ५. यह (कः) = आनन्दमय वृत्तिवाला व्यक्ति (तोकाय) = उत्तम सन्तानों के लिए (अधिब्रवत्) = प्रभु से कहता है, अर्थात् उत्तम सन्तानों के लिए प्रार्थना करता है । (कः) = यह आनन्दमय पुरुष (इभाय उत राये) = हाथी और धन के लिए प्रार्थना करता है - प्रभु से चाहता है कि मेरे पास इतना धन हो कि मेरे द्वार पर हाथी बँधे हों । इस प्रकार उत्तम सन्तानों व धनों को प्राप्त करके (तन्वे) = यह अपने शरीर के लिए प्रार्थना करता है कि मेरे शरीर की सब शक्तियाँ ठीक से विस्तृत रहें [तनु विस्तारे] । ६. (कः) = यह आनन्दमय पुरुष (जनाय) = लोकहित के लिए प्रार्थना करता है । यह केवल अपने तक ही सीमित नहीं रह जाता । स्वार्थ से ऊपर उठने के कारण ही वस्तुतः आनन्द प्राप्त करता है । अपने लिए उत्तम सन्तान, धन व शरीर की प्रार्थना इसी उद्देश्य से है कि वह लोकहित के कार्यों को करने में सशक्त हो ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ = उसके जीवन में आनन्द है जोकि वासनाओं से अपने को बचाता है, प्रभु में विश्वास रखता हुआ निर्भय बनता है, सांसारिक दृष्टिकोण से उन्नत होकर लोकहित करता है ।