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को अ॒द्य यु॑ङ्क्ते धु॒रि गा ऋ॒तस्य॒ शिमी॑वतो भा॒मिनो॑ दुर्हृणा॒यून्। आ॒सन्नि॑षून्हृ॒त्स्वसो॑ मयो॒भून्य ए॑षां भृ॒त्यामृ॒णध॒त्स जी॑वात् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ko adya yuṅkte dhuri gā ṛtasya śimīvato bhāmino durhṛṇāyūn | āsanniṣūn hṛtsvaso mayobhūn ya eṣām bhṛtyām ṛṇadhat sa jīvāt ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

कः। अ॒द्य। यु॒ङ्क्ते॒। धु॒रि। गाः। ऋ॒तस्य॑। शिमी॑ऽवतः। भा॒मिनः॑। दुःऽहृ॒णा॒यून्। आ॒सन्ऽइ॑षून्। ह॒त्सु॒ऽअसः॑। म॒य॒ऽभून्। यः। ए॒षा॒म्। भृ॒त्याम्। ऋ॒णध॑त्। सः। जी॒वा॒त् ॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:84» मन्त्र:16 | अष्टक:1» अध्याय:6» वर्ग:8» मन्त्र:1 | मण्डल:1» अनुवाक:13» मन्त्र:16


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर सेनापति के योग्य कर्म का उपदेश करते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - (कः) कौन (अद्य) इस समय (ऋतस्य) सत्य आचरण सम्बन्धी (शिमीवतः) उत्तम क्रियायुक्त (भामिनः) शत्रुओं के ऊपर क्रोध करने (दुर्हृणायून्) शत्रुओं को जिनका दुर्लभ सहसा कर्म उनके समान आचरण करने (आसन्निषून्) अच्छे स्थान में बाण पहुँचाने (हृत्स्वसः) शत्रुओं के हृदय में शस्त्र प्रहार करने और (मयोभून्) स्वराज्य के लिये सुख करनेहारे श्रेष्ठ वीरों को (धुरि) संग्राम में (युङ्क्ते) युक्त करता है वा (यः) जो (एषाम्) इनकी जीविका के निमित्त (गाः) भूमियों को (ऋणधत्) समृद्धियुक्त करे (सः) वह (जीवात्) बहुत समय पर्यन्त जीवे ॥ १६ ॥
भावार्थभाषाः - सबका अध्यक्ष राजा सबको प्रकट आज्ञा देवे। सब सेना वा प्रजास्थ पुरुषों को सत्य आचरणों में नियुक्त करे। सर्वदा उनकी जीविका बढ़ाके आप बहुत काल पर्यन्त जीवे ॥ १६ ॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

ज्ञानोज्ज्वल जीवन

पदार्थान्वयभाषाः - १. (कः) = वह आनन्दस्वरूप प्रभु (अद्य) = आज, इस मानवदेह में (ऋतस्य धुरि) = यज्ञ के निर्वाह में, अर्थात् यज्ञादि कर्मों में प्रवृत्त कराने के लिए (गाः) = ज्ञान की वाणियों को (युंक्ते) = हमारे साथ युक्त करता है । ये ज्ञान की वाणियाँ (शिमीवतः) = कर्मवाली हैं, इनमें कर्मों का उपदेश दिया गया है - 'कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि' । (भामिनः) ये उज्ज्वल हैं - सत्यज्ञानवाली होने से ये चमकती हुई हैं, हमारे जीवनों को भी उज्ज्वल बनाती हैं । (दुर्हृणायून्) = [हृणीयतिर्हानिकर्मा] ये [हातुमशक्यान्] छोड़ने योग्य नहीं । स्वाध्याय के नित्य कर्तव्य होने से इनका छोड़ना सम्भव नहीं । (आसन् इषून्) = मुख में ये गमनवाली हैं । मुख से इनका उच्चारण होता है, अथवा ये इषुतुल्य हैं । उच्चरित हुई - हुई ये शत्रुओं का संहार करनेवाली हैं । (हृत्स्वसः) हृदयों में चमकनेवाली हैं [अस् कान्ति] । हृदय में ही इनका प्रकाश होता है । (मयोभून्) = ये कल्याण का भावन करनेवाली हैं । २. (यः) = जो भी व्यक्ति (एषाम्) = इन ज्ञानवचनों के (भृत्याम्) = भरण को, धारण को (ऋणधत्) = समृद्ध करता है, बढ़ाता है, अर्थात् इन्हें अधिक - से - अधिक धारण करता है (सः जीवात्) = वही वस्तुतः जीता है, सुन्दर जीवनवाला होता है । ज्ञान की वाणियों के भरण से रहित पुरुष तो पशुतुल्य जीवनवाले हैं और इस प्रकार जीवन्मृत - से ही हैं । जीवन तो वही है जोकि ज्ञान से उज्ज्वल है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ = ज्ञान की वाणियाँ ही मनुष्य के जीवन को उज्ज्वल बनाती हैं ।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनः सेनापतेः कृत्यमुपदिश्यते ॥

अन्वय:

कोऽद्यर्तस्य शिमीवतो भामिनो दुर्हृणायूनासन्निषून् हृत्स्वसो मयोभून् सुवीरान् धुरि युङ्क्ते य एषां भृत्यां गा ऋणधत् स चिरञ्जीवात् ॥ १६ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - (कः) (अद्य) इदानीम् (युङ्क्ते) युक्तो भवति (धुरि) शत्रुहिंसने युद्धे (गाः) भूमीः (ऋतस्य) सत्याचारस्य (शिमीवतः) प्रशस्तकर्मयुक्तान् (भामिनः) शत्रूणामुपरिक्रोधकारिणः (दुर्हृणायून्) शत्रुभिर्दुर्लभं हृणं प्रसह्यकरणं येषां ते दुर्हृणास्त इवाचरन्तीति दुर्हृणायवस्तान् यन्त्यत्र क्याच्छन्दसीत्युः प्रत्ययः। (आसन्निषून्) आसने प्राप्ता बाणा यैस्तान् (हृत्स्वसः) ये हृत्स्वस्यन्ति बाणान् तान् (मयोभून्) मयः सुखं भावुकान् (यः) (एषाम्) (भृत्याम्) भृत्येषु साध्वीं सेनाम् (ऋणधत्) समृध्नुयात् (सः) (जीवात्) चिरञ्जीवेत् ॥ १६ ॥
भावार्थभाषाः - सर्वाध्यक्षो राजा सर्वान् प्रसिद्धामाज्ञां दद्यात् सर्वान् सेनास्थवीरान् सत्याचारेण युञ्जीत सदैषां जीविकां वर्द्धयित्वा स्वयं दीर्घायुः स्यात् ॥ १६ ॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Who joins the bullocks to the front yoke of the chariot of Truth to-day as ever? The Lord Ruler of the universe. And he who joins men of noble action, heroes of passion and righteousness, frightful fighters, archers of the bow and arrow who pierce the hearts of contradictions and maintain peace and joy, may he who joins these to truth and promotes these servants of truth to prosperity live long.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The duty of Indra (Commander of the army) is taught further in the 16th Mantra.

अन्वय:

Who yokes or appoints today in the battle the active, vigorous brave soldiers of the king of truthful nature whose fury to the wicked enemies is unbearable and who use powerful arrows and other weapons, who trample on the heart of the foes and who give happiness to friends. He who helps in the prosperity of the army good to all members and attendants and to the land, obtains long life.

पदार्थान्वयभाषाः - (धुरिं) शत्रुहिंसने युद्धे = In the battle where enemies are killed. (शिमीवतः) प्रशस्तकर्मयुक्तान = Actively engaged in the performance of noble deeds. (भृत्याम्) भृत्येषु साध्वीं सेनाम् = Army good to all members and attendants.
भावार्थभाषाः - The King who is the Supervisor of all, should give orders to all and should make all soldiers of the army full of truthful character and conduct. He should always bear in mind their livelihood and welfare and should obtain long life by observing the rules of health.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - सर्वांचा अध्यक्ष असलेल्या राजाने सर्वांना प्रत्यक्ष आज्ञा द्यावी. सर्व सेना व प्रजेतील पुरुषांना सत्याचरणात नियुक्त करावे. त्यांची जीविका वाढवून स्वतः दीर्घकाळ जिवंत राहावे. ॥ १६ ॥