अत्राह॒ गोर॑मन्वत॒ नाम॒ त्वष्टु॑रपी॒च्य॑म्। इ॒त्था च॒न्द्रम॑सो गृ॒हे ॥
atrāha gor amanvata nāma tvaṣṭur apīcyam | itthā candramaso gṛhe ||
अत्र॑। अह॑। गोः। अ॒म॒न्व॒त॒। नाम॑। त्वष्टुः॑। अ॒पी॒च्य॑म्। इ॒त्था। च॒न्द्रम॑सः। गृ॒हे ॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अब राजा का सूर्य के समान करने योग्य कर्म का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
चन्द्रमा के घर में
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अथ राज्ञः सूर्यवत्कृत्यमुपदिश्यते ॥
हे राजादयो मनुष्या ! यूयं यथाऽत्र नाम गोश्चन्द्रमसस्त्वष्टुरपीच्यमस्तीत्थामन्वत तथाऽह न्यायप्रकाशाय प्रजागृहे वर्त्तध्वम् ॥ १५ ॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
Wisemen recognise the hidden ray of the sun in the mansion of the moon i. e. the moon borrows her light from the sun. It is the rays of the sun which are manifest in the world. In the same manner, O ye king and other officers of the State, you should mingle with the subjects in their homes for the manifestation of justice.
