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ता अ॑स्य पृशना॒युवः॒ सोमं॑ श्रीणन्ति॒ पृश्न॑यः। प्रि॒या इन्द्र॑स्य धे॒नवो॒ वज्रं॑ हिन्वन्ति॒ साय॑कं॒ वस्वी॒रनु॑ स्व॒राज्य॑म् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

tā asya pṛśanāyuvaḥ somaṁ śrīṇanti pṛśnayaḥ | priyā indrasya dhenavo vajraṁ hinvanti sāyakaṁ vasvīr anu svarājyam ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

ताः। अ॒स्य॒। पृ॒श॒न॒ऽयुवः॑। सोम॑म्। श्री॒ण॒न्ति॒। पृश्न॑यः। प्रि॒याः। इन्द्र॑स्य। धे॒नवः॑। वज्र॑म्। हि॒न्व॒न्ति॒। साय॑कम्। वस्वीः॑। अनु॑। स्व॒ऽराज्य॑म् ॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:84» मन्त्र:11 | अष्टक:1» अध्याय:6» वर्ग:7» मन्त्र:1 | मण्डल:1» अनुवाक:13» मन्त्र:11


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

अब फिर उससे सम्बन्धित गुणों का उपदेश किया है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे मनुष्यो ! तुम लोग (अस्य) इस (इन्द्रस्य) सूर्य वा सेना के अध्यक्ष की (पृशनायुवः) अपने को स्पर्श करनेवाली अर्थात् उलट-पलट अपना स्पर्श करना चाहती (पृश्नयः) स्पर्श करती और (प्रियाः) प्रसन्न करनेहारी (धेनवः) किरण वा गौ वा वाणी (सोमम्) ओषधि रस वा ऐश्वर्य को (श्रीणन्ति) सिद्ध करती और (सायकम्) दुर्गुणों को क्षय करनेहारे ताप वा शस्त्रसमूह को (हिन्वन्ति) प्रेरणा देती है (वस्वीः) और वे पृथिवी से सम्बन्ध करनेवाली (स्वराज्यम्) अपने राज्य के (अनु) अनुकूल होती है, उनको प्राप्त होओ ॥ ११ ॥
भावार्थभाषाः - जैसे गोपाल की गौ जल रस को पी, घास को खा, निज सुख को बढ़ाकर, औरों के आनन्द को बढ़ाती है, वैसे ही सेनाध्यक्ष की सेना और सूर्य की किरण औषधियों से वैद्यकशास्त्र के अनुकूल वा उत्पन्न हुए परिपक्व रस को पीकर विजय और प्रकाश को करके आनन्द कराती हैं ॥ ११ ॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

"सायक" वज्र

पदार्थान्वयभाषाः - १. (ताः) = गतमन्त्र में वर्णित शुद्ध इन्द्रियाँ [गौर्यः] (अस्य) = इस आत्मतत्त्व के, इन्द्र के (पृशनायुवः) = स्पर्श की कामनावाली (पृश्नयः) = [संस्पृष्टो भासा = नि० २/१४] ज्योति से युक्त हुई - हुई (सोमम्) = सोम को (श्रीणन्ति) = शरीर में ही परिपक्व करती हैं । सोम को शरीर में सुरक्षित करके विविध शक्तियों का पोषण करती हैं । इस सोम के रक्षण से ही तो वे आत्मतत्त्व का स्पर्श करनेवाली हो पाएँगी । २. ऐसा होने पर (इन्द्रस्य) = इन इन्द्रियों के अधिष्ठाता जीव को (धेनवः) = ज्ञानदुग्ध का पान करानेवाली वेदवाणियाँ (प्रियाः) = प्रिय होती हैं और वे वाणियाँ उसके जीवन में (सायकम्) = सब शत्रुओं का अन्त करनेवाले (वज्रम्) = क्रियाशीलतारूप वज्र को (हिन्वन्ति) = प्रेरित करती हैं, अर्थात् यह क्रियाशील बनता है । ३. इस प्रकार ये इन्द्रियाँ (वस्वीः) = निवास को उत्तम बनानेवाली होती हैं, होती तभी हैं, जबकि (अनु स्वराज्यम्) = हम आत्मशासन की वृत्तिवाले होते हैं । संयम के पश्चात् ही इन्द्रियाँ उत्तम निवास का कारण बनती हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ = शरीर में सोम के परिपाक से इन्द्रियाँ आत्मदर्शन के योग्य बनती हैं । इस सोमपान करनेवाले को वेदवाणियाँ प्रिय होती है और यह उनमें उपदिष्ट कार्यों को करनेवाला होता है ।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनस्तत्सम्बन्धिगुणा उपदिश्यन्ते ॥

अन्वय:

हे मनुष्या ! यूयमस्येन्द्रस्य याः पृशनायुवः पृश्नयः प्रिया धेनवः सोमं श्रीणन्ति सायकं वज्रं हिन्वन्ति वस्वीः स्वराज्यमनुभवन्ति ताः प्राप्नुत ॥ ११ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - (ताः) उक्ता वक्ष्यमाणाश्च (अस्य) (पृशनायुवः) आत्मनः स्पर्शमिच्छन्त्यः। अत्र छान्दसो वर्णलोपो वेति सलोपः। (सोमम्) पदार्थरसमैश्वर्यं वा (श्रीणन्ति) पचन्ति (पृश्नयः) याः स्पृशन्ति ताः। अत्र घृणिपृश्नि० (उणा०४.५४) अनेनायं निपातितः। (प्रियाः) तर्पयन्ति ताः (इन्द्रस्य) सूर्यस्य वा सेनाध्यक्षस्य वा (धेनवः) किरणा गावो वाचो वा (वज्रम्) तापसमूहं किरणसमूहं वा (हिन्वन्ति) प्रेरयन्ति (सायकम्) स्यन्ति क्षयन्ति येन तम् (वस्वीः) पृथिवीसम्बन्धिन्यः (अनु) (स्वराज्यम्) ॥ ११ ॥
भावार्थभाषाः - यथा गोपालस्य धेनवो जलं पीत्वा घासं जग्ध्वा सुखं वर्धित्वाऽन्येषामानन्दं वर्धयन्ति, तथैव सेनाध्यक्षस्य सेनाः सूर्यस्य च किरणा ओषधीभ्यो वैद्यकशास्त्रसम्पादितं परिपक्वं वा रसं पीत्वा विजयं प्रकाशं वा कृत्वानन्दयन्ति ॥ ११ ॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Those forces of Indra, the ruler, close together in contact and unison, of varied forms and colours, brilliant as sunrays and generous and productive as cows, who are dearest favourites of the ruler, create the soma of joy and national dignity and hurl the missile of the thunderbolt upon the invader as loyal citizens of the land in accordance with the demands and discipline of freedom and self-government.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The attributes of Indra are taught further in the 11th Mantra.

अन्वय:

Desirous of his contact, the dear many kind cows of Indra (Commander of the army) give abundant milk with love which is mixed with Soma (Juice of various potent herbs) to strength him. Thus making him strong, they prompt him to use him thunder bold-like powerful weapons which kill wicked enemies. They and other subjects live happily under the sway of Indra (President of the State or the Commander of the Army ). The orders of the command er of the army are obeyed by his troops and they live happily under him, taking nourishing milk and other nourishing substances.

पदार्थान्वयभाषाः - (पृशनायुव:) श्रात्मन: स्पर्शमिच्छन्त्यः। अत्र छान्दसो वर्णलोपो वेति सलोपः । = Desiring touch or contact. (सोमम्) पदार्थरसम् ऐश्वर्य वा = The juice of nourishing substances or prosperity. (इन्द्रस्य) सूर्यस्य सेनाध्यक्षस्य वा = Of the sun or the commander of the army. (सायकम्) स्यन्ति क्षयन्ति येन तम् = Destructive. (षो-अन्तकर्मणि )
भावार्थभाषाः - As the cows of the cowherd taking water and eating grass increase others' joy by giving good milk, in the same manner, the armies of the commander and the rays of the sun by preparing the juice of the nourishing herbs according to the Shastric prescribed method, get victory and gladden all.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - जशी गोपालाची धेनू जल प्राशन करून स्वतःचे सुख वाढवून आनंदाची वृद्धी करते तसेच सेनाध्यक्षाची सेना सूर्यकिरणाच्या औषधीद्वारे वैद्यकशास्त्रानुसार उत्पन्न झालेला रस प्राशन करून प्रकाश प्राप्त करून विजय व आनंद मिळवून देते. ॥ ११ ॥