प्र पू॒तास्ति॒ग्मशो॑चिषे॒ वाचो॑ गोतमा॒ग्नये॑। भर॑स्व सुम्न॒युर्गिरः॑ ॥
pra pūtās tigmaśociṣe vāco gotamāgnaye | bharasva sumnayur giraḥ ||
प्र। पू॒ताः। ति॒ग्मऽशो॑चिषे। वाचः॑। गोतम। अ॒ग्नये॑। भर॑स्व। सु॒म्न॒ऽयुः। गिरः॑ ॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
फिर भी अगले मन्त्र में विद्वान् कैसा हो, इस विषय का उपदेश किया है ॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
सुम्नयुः
स्वामी दयानन्द सरस्वती
पुनः स कीदृश इत्युपदिश्यते ॥
हे गोतम ! सुम्नयुस्त्वं विद्वांसः तिग्मशोचिषेऽग्नये याः पूतागिरो धरन्ति ता वाचः प्रभरस्व ॥ १० ॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
How is Agni, is further in the tenth Mantra.
O Praiser of Truth, thou who desirest thy happiness, utter those pure words full of wisdom, education and sermon which learned persons use for highly intelligent men.
