अ॒भि त्वा॒ गोत॑मा गि॒रा जात॑वेदो॒ विच॑र्षणे। द्यु॒म्नैर॒भि प्र णो॑नुमः ॥
abhi tvā gotamā girā jātavedo vicarṣaṇe | dyumnair abhi pra ṇonumaḥ ||
अ॒भि। त्वा॒। गोत॑माः। गि॒रा। जात॑ऽवेदः। विऽच॑र्षणे। द्यु॒म्नैः। अ॒भि। प्र। नो॒नु॒मः॒ ॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अब अठहत्तरवें सूक्त का आरम्भ किया जाता है। इसके प्रथम मन्त्र में उन्हीं विद्वानों के गुणों का उपदेश किया है ॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
युम्नों की प्राप्ति
स्वामी दयानन्द सरस्वती
पुनः स कीदृश इत्युपदिश्यते ॥
हे जातवेदो विचर्षणे परमात्मन् ! यं त्वां यथा गोतमा द्युम्नैर्गिरा स्तुवन्ति यथा च वयमभि प्रणोनुमस्तथा सर्वे मनुष्याः कुर्य्युः ॥ १ ॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
O God knower and Beholder of all that exists, We praisers or devotees glorify Thee repeatedly with knowledge and other virtues. Let other men also do like wise.
माता सविता जोशी
(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)या सूक्तात ईश्वर व विद्वानांच्या गुणांचे कथनाने या सूक्तार्थाची पूर्वसूक्तार्थाबरोबर संगती जाणावी. ॥
