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कस्ते॑ जा॒मिर्जना॑ना॒मग्ने॒ को दा॒श्व॑ध्वरः। को ह॒ कस्मि॑न्नसि श्रि॒तः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

kas te jāmir janānām agne ko dāśvadhvaraḥ | ko ha kasminn asi śritaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

कः। ते॒। जा॒मिः। जना॑नाम्। अग्ने॑। कः। दा॒शुऽअ॑ध्वरः। कः। ह॒। कस्मि॑न्। अ॒सि॒। श्रि॒तः ॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:75» मन्त्र:3 | अष्टक:1» अध्याय:5» वर्ग:23» मन्त्र:3 | मण्डल:1» अनुवाक:13» मन्त्र:3


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर वह कैसा हो, यह विषय कहा है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे (अग्ने) विद्वन् ! (जनानाम्) मनुष्यों के बीच (ते) आपका (कः) कौन मनुष्य (ह) निश्चय करके (जामिः) जाननेवाला है (कः) कौन (दाश्वध्वरः) दान देने और रक्षा करनेवाला है, तू (कः) कौन है और (कस्मिन्) किसमें (श्रितः) आश्रित (असि) है, इस सब बात का उत्तर दे ॥ ३ ॥
भावार्थभाषाः - बहुत मनुष्यों में कोई ऐसा होता है कि जो परमेश्वर और अग्न्यादि पदार्थों को ठीक-ठीक जाने और जनावे, क्योंकि ये दोनों अत्यन्त आश्चर्य्य गुण, कर्म और स्वभाववाले हैं ॥ ३ ॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

अज्ञेय व अचिन्त्य प्रभु

पदार्थान्वयभाषाः - १. हे प्रभो । (जनानाम्) = मनुष्यों में (कः) = कौन (ते) = तेरा (जामिः) = बन्धु हैं । जैसे बन्धुओं में कुछ समानता - सी होती है, इस प्रकार हे प्रभो ! मनुष्यों में आपके समान कौन है, अर्थात् कोई भी आपकी समता नहीं कर सकता । सामान्य मनुष्य के विषय में तो प्रश्न ही नहीं उठता “न मुक्तानामपि हरेः साम्यम्” - इन पुराण - शब्दों के अनुसार मुक्त जीव भी उस प्रभु के सम नहीं हो पाते । “जगद्व्यापारवर्जमितरेषामैश्वर्यम्” - इस वेदान्तसूत्र के अनुसार मुक्त भी प्रभु के समान सृष्टि का निर्माण तो नहीं कर सकते । हे प्रभो ! (कः) = कौन आपकी भांति (दाश्वध्वरः) = [दाशुर्दत्तोऽध्वरो येन] वेदवाणी के द्वारा इन यज्ञात्मक कर्मों का उपदेश देनेवाला है ? आप ही सब यज्ञों का प्रतिपादन करनेवाले हैं । २. (कः ह) = आप निश्चय से कौन हैं ? यह किसी से भी जाना नहीं जा सकता । (कस्मिन् श्रितः असि) = किसमें आप आश्रित हैं ? कौन आपका आधार है ? यह भी तो नहीं कहा जा सकता । वस्तुतः वे प्रभु अचिन्त्यस्वरूप व अचिन्त्य महिमावाले हैं । हम आपको पूरा - पूरा जान नहीं सकते । देहधारी के लिए निराकार का जानना कैसे सम्भव हो सकता है ?
भावार्थभाषाः - भावार्थ - परमात्मा अज्ञेय व अचिन्त्य हैं ।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनः स कीदृश इत्युपदिश्यते ॥

अन्वय:

हे अग्ने विद्वन् ! जनानां मध्ये ते तव को ह जामिरस्ति को दाश्वध्वरस्त्वं कः कस्मिन् श्रितोऽसीत्यस्य सर्वस्य वदोत्तरम् ॥ ३ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - (कः) (ते) तव (जामिः) ज्ञाता। अत्र ज्ञा धातोर्बाहुलकादौणादिको मिः प्रत्ययो जादेशश्च। (जनानाम्) मनुष्याणां मध्ये (अग्ने) सकलविद्यावित् (कः) (दाश्वध्वरः) दाशुर्दाताऽध्वरोऽहिंसको यस्मिन् सः (कः) (ह) किल (कस्मिन्) (असि) (श्रितः) आश्रितः ॥ ३ ॥
भावार्थभाषाः - मनुष्याणां मध्ये कश्चिदेव परमेश्वरस्याग्न्यादेश्च विज्ञाता विज्ञापको भवितुं शक्नोति। कुत एतयोरत्यन्ताश्चर्य्यगुणकर्मस्वभाववत्त्वात् ॥ ३ ॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Agni, who among people is your brother that knows well? Who is the giver? Who is the yajaka? Who are you? Wherein do you abide.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

How is Agni, is taught in the third Mantra.

अन्वय:

O knower of all Vidyas (sciences) who among men knows you well ? who is the liberal performer of non-violent sacrifices ? who are you and dependent on whom ? Give answer to these questions.

पदार्थान्वयभाषाः - (जामि:) ज्ञाता प्रत्र माधातोर्बाहुलकादौरणादिको मि प्रत्ययो जादेशश्च । = Knower. (अग्ने ) सकलविद्यावित् = Knower of all sciences.
भावार्थभाषाः - It is rare among men to find. who know well and teach about God and fire etc., because they (God and fire) are endowed with wonderful attributes.
टिप्पणी: It is clear from Rishi Dayananda's Bhavartha or purport that he takes from the word Agni used here not only a learned person or fire but also God. In that case, the meaning will be Who O Omniscient God is Thy perfect knower ? Who is it that can perform non-violent sacrifices in altogether perfect manner ? Who art Thou should be known by us. On whom art Thou dependent ? On none.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - पुष्कळ माणसांपैकी एखादाच असा असतो की जो परमेश्वर व अग्नी इत्यादी पदार्थांना यथायोग्य जाणतो व जाणवून देतो, कारण हे दोन्ही अत्यंत आश्चर्यकारक गुण कर्म स्वभावाचे असतात. ॥ ३ ॥