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उ॒त द्यु॒मत्सु॒वीर्यं॑ बृ॒हद॑ग्ने विवाससि। दे॒वेभ्यो॑ देव दा॒शुषे॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

uta dyumat suvīryam bṛhad agne vivāsasi | devebhyo deva dāśuṣe ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

उ॒त। द्यु॒ऽमत्। सु॒ऽवीर्य॑म्। बृ॒हत्। अ॒ग्ने॒। वि॒वा॒स॒सि॒। दे॒वेभ्यः॑। दे॒व॒। दा॒शुषे॑ ॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:74» मन्त्र:9 | अष्टक:1» अध्याय:5» वर्ग:22» मन्त्र:4 | मण्डल:1» अनुवाक:13» मन्त्र:9


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर वह कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे (देव) दिव्य गुण, कर्म्म और स्वभाववाला (अग्ने) अग्निवत् प्रज्ञा से प्रकाशित विद्वान् ! तू (दाशुषे) देने के स्वभाववाले कार्य्यों के अध्यक्ष (उत) अथवा (देवेभ्यः) विद्वानों के लिये (द्युमत्) अच्छे प्रकाशवाले (बृहत्) बड़े (सुवीर्य्यम्) अच्छे पराक्रम को (विवासति) सेवन करता है, वैसे हम भी उसका सेवन करें ॥ ९ ॥
भावार्थभाषाः - जो कार्यों के स्वामी होवें, उन विद्वानों के सकाश से विद्या और पुरुषार्थ करके विद्वान् तथा भृत्यों को बड़े-बड़े उपकारों का ग्रहण करना चाहिये ॥ ९ ॥ इस सूक्त में ईश्वर विद्वान् और विद्युत् अग्नि के गुणों का वर्णन होने से पूर्वसूक्तार्थ के साथ इस सूक्त की सङ्गति है ॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

ज्योतिर्मय शक्ति

पदार्थान्वयभाषाः - १. हमारे जीवनों में “मातृदेवो भव, पितृदेवो भव, आचार्यदेवो भव, अतिथिदेवो भव” - इस उपनिषद् - वाक्य के अनुसार पाँच वर्ष तक माता का स्थान है, आठ वर्ष तक पिता का, पच्चीस वर्ष तक आचार्य का, तदुपरान्त गृहस्थ में अतिथियों का । इन (देवेभ्यः) = देवताओं के लिए (दाशुषे) = अपना अर्पण करनेवालों के लिए हे (अग्ने) = अग्रणी देव - दिव्यगुणों के पुञ्ज प्रभो ! आप (बृहत्) = वृद्धि के कारणभूत (उत) = और (द्युमत्) = ज्योतिर्मय (सुवीर्यम्) = उत्तम शक्ति को (विवाससि) = प्राप्त कराते हैं । २. शक्ति के बिना किसी प्रकार की उन्नति सम्भव नहीं होती, परन्तु यह शक्ति द्युमत् = ज्योतिर्मय होनी चाहिए । ज्योति के अभाव में शक्ति उन्नति का कारण न होकर अवनति व ह्रास का कारण हो जाती है । ३. यह शक्ति प्राप्त उसी को होती है जो माता - पिता आदि देवों के प्रति अपना अर्पण करके चलता है । उनकी आज्ञा व निर्देशों में चलता हुआ व्यक्ति ही ज्योतिर्मय शक्ति को प्राप्त करता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - माता - पितादि देवों के प्रति अपना अर्पण करने के द्वारा हम ज्योतिर्मय प्रवृद्ध शक्ति को प्राप्त करें ।
टिप्पणी: विशेष - सूक्त के आरम्भ में कहा है कि यज्ञ व स्तवन हमारे जीवनों के आवश्यक अङ्ग होने चाहिएँ [२] । प्रभु अर्पणशील को ऐश्वर्य प्राप्त कराते हैं [२] । प्रभु - स्मरण करनेवाला प्रत्येक रण में विजयी होता है [३] । सुन्दर - शिव जीवन बनाने के लिए हम प्रभु के सन्देश को सुनें, सात्त्विक भोजन करें, हिंसारहित कर्मों में प्रवृत्त हों [४] । सुहव्य, सुदेव, सुबर्हिष् बनें [५] । सात्त्विक भोजन से दिव्यता का विकास होता है [६] । दुष्ट - वृत्ति का पुरुष देव के सन्देशों को नहीं सुनता [७] । प्रभु से रक्षित व्यक्ति आगे - और - आगे बढ़ता है [८] । देवार्पण करनेवाले व्यक्ति को प्रभु ज्योतिर्मय शक्ति प्राप्त कराते हैं [९] । हम हव्य पदार्थों का ही सेवन करें - इन शब्दों से अगला सूक्त आरम्भ होता है -
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनः स कीदृश इत्युपदिश्यते ॥

अन्वय:

हे देवाऽग्ने विद्वन् ! यथा त्वं दाशुष उत देवेभ्यो द्युमद् बृहत्सु वीर्य्यं विवाससि, तथा तं वयं सदा सेवेमहि ॥ ९ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - (उत) अपि (द्युमत्) प्रशस्तप्रकाशवत् (सुवीर्य्यम्) सुष्ठु पराक्रमम् (बृहत्) महान्तम् (अग्ने) विद्युदादिस्वरूपवद्वर्त्तमान (विवाससि) परिचरसि (देवेभ्यः) विद्वद्भ्यः (देवः) दिव्यगुणकर्म्मस्वभावयुक्त (दाशुषे) दानशीलाय कार्य्याधिपतये ॥ ९ ॥
भावार्थभाषाः - कार्य्यस्वामिनां विद्वद्भिर्भृत्यैश्च विद्यापुरुषार्थाभ्यां विदुषां सकाशान्महान्त उपकाराः संग्राह्याः ॥ ९ ॥ अत्रेश्वरविद्वद्विद्युदग्निगुणवर्णनादेतदर्थस्य पूर्वसूक्तार्थेन सह सङ्गतिरस्तीति वेदितव्यम् ॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Agni, lord of light, wealth and generosity, you are ever keen to shower upon the charitable yajamana and eminent scholars of scientific brilliance abundant gifts of valour, honour and universal excellence.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

How is Agni is taught further in the ninth Mantra.

अन्वय:

O learned person, thou who art like electricity, fire etc. endowed with divine virtues, actions and temperament, as thou art desirous of bestowing upon the liberal master of the works and other educated persons brilliant great strength or vigor, so we always serve thee.

भावार्थभाषाः - Learned persons and their attendants should take great beneficial acts from the masters of works. This hymn is connected with the previous hymn as it deals with God, learned persons, electricity and fire. Here ends the commentary on the seventy-fourth hymn and 22nd Verga of the first Mandala of the Rigveda.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - कार्याधिपतीनी विद्वानांच्या साह्याने विद्या व पुरुषार्थ करून विद्वानांवर व सेवकांवर महान उपकार करावेत. ॥ ९ ॥