वांछित मन्त्र चुनें

उ॒त ब्रु॑वन्तु ज॒न्तव॒ उद॒ग्निर्वृ॑त्र॒हाज॑नि। ध॒नं॒ज॒यो रणे॑रणे ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

uta bruvantu jantava ud agnir vṛtrahājani | dhanaṁjayo raṇe-raṇe ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

उ॒त। ब्रु॒व॒न्तु॒। ज॒न्तवः॑। उत्। अ॒ग्निः। वृ॒त्र॒ऽहा। अ॒ज॒नि॒। ध॒न॒म्ऽज॒यः। रणे॑ऽरणे ॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:74» मन्त्र:3 | अष्टक:1» अध्याय:5» वर्ग:21» मन्त्र:3 | मण्डल:1» अनुवाक:13» मन्त्र:3


0 बार पढ़ा गया

स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर वह कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - जो (रणेरणे) युद्ध-युद्ध में (धनञ्जयः) धन से जितानेवाला (वृत्रहा) मेघ को नष्ट करनेहारे सूर्य्य के समान (अग्निः) परमेश्वर (दाशुषे) विद्या, शुभ गुणों के दान करनेवाले मनुष्य के लिये (गयम्) धन को (उदजनि) उत्पन्न करता है (उत्) और भी जिसका विद्वान् लोग उपदेश करते हैं (जन्तवः) सब मनुष्य (अध्वरम्) हिंसारहित (मन्त्रम्) उसी के विचार को (उपब्रुवन्तु) परस्पर उपदेश करें ॥ ३ ॥
भावार्थभाषाः - हे मनुष्यो ! तुम जिसके आश्रय से शत्रुओं के पराजय द्वारा अपने विजय से राज्यधनों की प्राप्ति होती है, उस परमेश्वर का नित्य सेवन किया करो ॥ ३ ॥
0 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

धनञ्जय

पदार्थान्वयभाषाः - १. (जन्तवः) = शरीरधारी मनुष्य (उत) = खूब ही (ब्रुवन्तु) उस प्रभु के गुणों व गुणवाचक नामों का उच्चारण करें । यह गुणों का स्मरण उन्हें उन गुणों के धारण की प्रेरणा देनेवाला होगा (उत) = और इस प्रकार धीरे - धीरे उन गुणों के अपनाते चले जाने पर वह (वृत्रहा) = ज्ञान के आवरणभूत सब मलों का - वासनाओं का नष्ट करनेवाला (अग्निः) = अग्रणी प्रभु (अजनि) = उनके हृदयों में प्रकट होता है । २. इस प्रभु का प्रादुर्भाव होने पर यह स्तोता (रणरणे) = प्रत्येक संग्राम में (धनंजयः) = धनों का विजय करनेवाला बनता है । प्रभु के साथ होने पर पराजय का क्या काम ? प्रभु के साथ होने पर विजय - ही - विजय होती है, पराजय तो उनसे अलग होने पर ही होती है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - हम प्रभु के नामों का उच्चारण करें । प्रभु को हृदय में प्रादुर्भूत करने का प्रयत्न करें, परिणामतः प्रत्येक संग्राम में हम विजयी होंगे ।
0 बार पढ़ा गया

स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनः स कीदृश इत्युपदिश्यते ॥

अन्वय:

यो रणेरणे धनञ्जयो वृत्रहेव दाशुषे गयमुदजनि। उतापि यं विद्वांस उपदिशन्ति, तं जन्तवोऽन्योन्यमुपब्रुवन्तु ॥ ३ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - (उत) अपि (ब्रुवन्तु) उपदिशन्तु (जन्तवः) जीवाः (उत्) उत्कृष्टे (अग्निः) विजयप्रदो भगवान् (वृत्रहा) मेघहन्ता सूर्य इवाविद्यान्धकारनाशकः (अजनि) जनयति (धनञ्जयः) यो धनेन जापयति सः (रणेरणे) युद्धे युद्धे ॥ ३ ॥
भावार्थभाषाः - हे मनुष्या ! यूयं यस्योपाश्रयेण शत्रूणां पराजयेन विजयः स्वविजयेन च राज्यधनानि जायन्ते, तं नित्यं सेवध्वम् ॥ ३ ॥
0 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - And let the people praise and celebrate Agni who dispels the clouds of darkness, creates and protects the wealth of the charitable yajamana, and gives us victory in the battles for wealth one after another.
0 बार पढ़ा गया

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

How is He (God) is taught further in the third Mantra.

अन्वय:

Let us speak about God with one another who is the Dispeller of all darkness of ignorance (as the sun is of the clouds). He provides wealth to the giver of knowledge and other virtues. It is He who causes victory to His noble devotees in every fight (internal as well as external).

पदार्थान्वयभाषाः - (जन्तवः) जीवा: = Souls (अग्निः) विजयप्रदो भगवान् = God who is the Giver of victory. (वृत्रहा) मेघहन्ता सूर्य: इव अविद्यान्धकारनाशकः = The Dispeller of the darkness of ignorance like the Sun of the clouds.
भावार्थभाषाः - O men, you should ever serve or adore God by taking shelter in whom enemies are conquered, victory is gained and prosperity of the State is acquired.
टिप्पणी: जन्तव इति मनुष्यनाम (निघ० २.३ ) पाप्मा वै वृत्रः (शतपथ १११.५.७)
0 बार पढ़ा गया

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - हे माणसांनो! ज्याच्या आश्रयामुळे शत्रूचा पराजय करून स्वतःला विजय प्राप्त होतो तसेच राज्य व धनाची प्राप्ती होते. त्या परमेश्वराचा तुम्ही नित्य स्वीकार करा. ॥ ३ ॥