उ॒प॒प्र॒यन्तो॑ अध्व॒रं मन्त्रं॑ वोचेमा॒ग्नये॑। आ॒रे अ॒स्मे च॑ शृण्व॒ते ॥
upaprayanto adhvaram mantraṁ vocemāgnaye | āre asme ca śṛṇvate ||
उ॒प॒ऽप्र॒यन्तः॑। अ॒ध्व॒रम्। मन्त्र॑म्। वो॒चे॒म॒। अ॒ग्नये॑। आ॒रे। अ॒स्मे इति॑। च॒। शृ॒ण्व॒ते ॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अब चौहत्तरवें सूक्त का आरम्भ किया जाता है, इसके प्रथम मन्त्र में ईश्वर के गुणों का उपदेश किया है ॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
यज्ञ व स्तवन
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अथेश्वरगुणा उपदिश्यन्ते ॥
हे मनुष्या ! यथोपप्रयन्तो वयमस्मे आरे च शृण्वतेऽग्नयेऽध्वरं मन्त्रं सततं वोचेम तथा यूयमपि वदत ॥ १ ॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
The attributes of God are taught.
O men, we chant a loving mantra to our Supreme Leader (God) and utter good words while doing non-violent noble deeds and sacrifices. He listens to our words everywhere, far and near. You should do also like-wise.
माता सविता जोशी
(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)या सूक्तात ईश्वर, विद्वान व विद्युत अग्नीच्या गुणाचे वर्णन असल्यामुळे पूर्वसूक्तार्थाबरोबर या सूक्ताची संगती जाणावी. ॥
