वांछित मन्त्र चुनें

आ रोद॑सी बृह॒ती वेवि॑दानाः॒ प्र रु॒द्रिया॑ जभ्रिरे य॒ज्ञिया॑सः। वि॒दन्मर्तो॑ ने॒मधि॑ता चिकि॒त्वान॒ग्निं प॒दे प॑र॒मे त॑स्थि॒वांस॑म् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ā rodasī bṛhatī vevidānāḥ pra rudriyā jabhrire yajñiyāsaḥ | vidan marto nemadhitā cikitvān agnim pade parame tasthivāṁsam ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

आ। रोद॑सी॒ इति॑। बृ॒ह॒ती इति॑। वेवि॑दानाः॑। प्र। रु॒द्रिया॑। ज॒भ्रि॒रे॒। य॒ज्ञिया॑सः। वि॒दत्। मर्तः॑। ने॒मऽधि॑ता। चि॒कि॒त्वान्। अ॒ग्निम्। प॒दे। प॒र॒मे। त॒स्थि॒ऽवांस॑म् ॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:72» मन्त्र:4 | अष्टक:1» अध्याय:5» वर्ग:17» मन्त्र:4 | मण्डल:1» अनुवाक:12» मन्त्र:4


0 बार पढ़ा गया

स्वामी दयानन्द सरस्वती

वेदों के पढ़नेवाले किस प्रकार के हों, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - जो (रुद्रिया) दुष्ट शत्रुओं को रुलानेवाले के सम्बन्धी (वेविदानाः) अत्यन्त ज्ञानयुक्त (यज्ञियासः) यज्ञ की सिद्धि करनेवाले विद्वान् लोग (बृहती) बड़े (रोदसी) भूमि राज्य वा विद्या प्रकाश को (आजभ्रिरे) धारण-पोषण करते और समग्र विद्याओं को जानते हैं, उनसे विज्ञान को प्राप्त होकर जो (चिकित्वान्) ज्ञानवान् (नेमधिता) प्राप्त पदार्थ को धारण करनेवाला (मर्त्तः) मनुष्य (परमे) सबसे उत्तम (पदे) प्राप्त करने योग्य मोक्ष पद में (तस्थिवांसम्) स्थित हुए (अग्निम्) परमेश्वर को (प्रविदत्) जानता है, वही सुख भोगता है ॥ ४ ॥
भावार्थभाषाः - मनुष्यों को चाहिये कि वेद के जाननेवाले विद्वानों से उत्तम नियम द्वारा वेदविद्या को प्राप्त हो विद्वान् होके परमेश्वर तथा उसके रचे हुए जगत् को जान अन्य मनुष्यों के लिये निरन्तर विद्या देवें ॥ ४ ॥
0 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

प्रभु - प्राप्ति के चार साधन

पदार्थान्वयभाषाः - १. (बृहती) = वृद्धि के कारणभूत, अर्थात् सब प्रकार से विकसित (रोदसी) = द्यावापृथिवी को - मस्तिष्क व शरीर को (आवेविदानाः) = सब प्रकार से प्राप्त करते हुए [विद् लाभे], शरीर और मस्तिष्क दोनों का समुचित विकास करते हुए (रूद्रियाः) = प्राणसाधना करनेवाले [रुद्राः प्राणा तेषु साधवः], (यज्ञियासः) = यज्ञों में उत्तम लोग (अग्निम्) = उस प्रकाशमय प्रभु को (प्रजभ्रिरे) = प्रकर्षेण ग्रहण करनेवाले होते हैं । प्रभु की प्राप्ति के लिए तीन बातें आवश्यक हैं - [क] शरीर व मस्तिष्क का समुचित विकास, [ख] प्राणसाधना, [ग] यज्ञशीलता । २. (चिकित्वान् मर्तः) = समझदार मनुष्य (नेमधिता) = संग्राम के द्वारा [नेम का शब्दार्थ आधा है, संग्राम में सेना दो भागों में बँटी होती है, आधी एक ओर आधी दूसरी ओर, इसलिए ‘नेमधित्’ संग्राम का नाम है] । हमारे हृदयक्षेत्र में भी देव व असुर वृत्तियों का संग्राम चलता ही है । “परमे पदे तस्थिवांसम्” परम पद में स्थित (अग्निम्) = उस परमात्मा को (विदत्) = प्राप्त करता है । एवं, पूर्वार्ध के तीन साधनों के साथ यह संग्राम प्रभु - प्राप्ति का चौथा साधन होता है । इन्हीं वासनाओं के साथ किये जानेवाले संग्राम से प्रभु का पूजन पुराणों में उपदिष्ट है - “ इत्थं युद्धैश्च यज्ञैश्च यजामो विष्णुमीश्वरम् ”।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - शरीर व मस्तिष्क का समुचित विकास, प्राणसाधना, यज्ञशीलता व वासनाओं के साथ संग्राम - इन चार साधनों से परमेष्ठी प्रभु की प्राप्ति होती है ।
0 बार पढ़ा गया

स्वामी दयानन्द सरस्वती

वेदानामध्येतारः कीदृशा भवेयुरित्युपदिश्यते ॥

अन्वय:

ये रुद्रिया वेविदाना यज्ञियासो विद्वांसो बृहती रोदसी आजभ्रिरे सर्वाविद्याविदंस्तेषां सकाशाद् विज्ञानं प्राप्य यश्चिकित्वान् नेमधिता मर्त्तः परमे पदे तस्थिवांसमग्निं प्रविदत् स सुखी जायते ॥ ४ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - (आ) अभितः (रोदसी) भूमिराज्यं विद्याप्रकाशं वा (बृहती) महत्यौ (वेविदानाः) अतिशयेन विज्ञानवन्तः (प्र) प्रकृष्टार्थे (रुद्रिया) शत्रून् दुष्टान् रोदयतां सम्बन्धिनो रुद्राः (जभ्रिरे) भरन्ति पुष्णन्ति (यज्ञियासः) यज्ञसम्पादने योग्याः (विदत्) जानाति (मर्त्तः) मनुष्यः (नेमधिता) नेमाः प्राप्ताः पदार्था धिता हिता येन सः। अत्र सुधितवसुधितनेमधितधिष्वधिषीय च। (अष्टा०७.४.४५) इति छन्दसि निपातनात् क्तप्रत्यये हित्वं प्रतिषिध्यते। सुपां सुलुगिति सोः स्थान आकारादेशः। (चिकित्वान्) ज्ञानवान् (अग्निम्) परमेश्वरम् (पदे) प्राप्तव्ये गुणसमूहे (परमे) सर्वोत्कृष्टे (तस्थिवांसम्) स्थितम् ॥ ४ ॥
भावार्थभाषाः - मनुष्यैर्वेदविदां सकाशात् सुनियमेन वेदविद्यां प्राप्य विद्वांसो भूत्वा परमेश्वरं तत्सृष्टं च विज्ञायाऽन्येभ्यो विद्या सततं दातव्याः ॥ ४ ॥
0 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Dedicated yajnic souls, lovers of Rudra pranas and devotees of Rudra, lord of justice and dispensation of karma, know, reach and replenish the vast heaven and earth with the fragrance of yajna. Such a man in mortal body finds the objects of his desire and, rising to divine knowledge, attains to the beatific vision of Agni abiding in the highest state of man’s spiritual experience.
0 बार पढ़ा गया

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

How should be the scholars of the Vedas is taught in the fourth Mantra.

अन्वय:

That man becomes happy who having received education from the brave great scholars, experts in performing Yajnas (non-violent sacrifices) or knowers and supporters of the vast heaven and the earth, well-versed in all sciences, becomes a great scholar, possessing the knowledge of all objects and knows God endowed with the most excellent attributes.

पदार्थान्वयभाषाः - (रुद्रिया:) शत्रून् दुष्टान् रोदयतां सम्बन्धिन: = Brave destroyers of wicked enemies. (नेमधिता:) नेमाः प्राप्ताः पदार्था धिताहिता येन अत्र सुधितवसुधितनेमधितधिष्वधिषीय च ( अष्टा० ७. ४. ४५) इति छन्दसि निपातनात् क्तप्रत्यये हित्वं प्रतिषिध्यते । सुपां सुलुक् इति सो: स्थाने प्रकारादेशः । = Possessing the knowledge of all objects. (पदे) प्राप्तव्ये गुणसमूहे = In the attributes that are to be attained. अग्निम् परमेश्वरम् = God. (पद-गतौ गतेत्रिष्वर्येषु प्राप्त्यर्थग्रहणमत्र ) || = Among the three meanings of the third meaning of attainment has been taken here).Tr.
भावार्थभाषाः - Men should receive the knowledge of the Vedas from the Vedic Scholars observing well-prescribed rules and regulations and after knowing God and His creation should give that knowledge to others.
0 बार पढ़ा गया

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - माणसांनी वेदज्ञ विद्वानांकडून उत्तम नियमाने वेदविद्या प्राप्त करून विद्वान बनावे. परमेश्वर व त्याने निर्माण केलेले जग जाणून इतर माणसांना निरंतर विद्या द्यावी. ॥ ४ ॥