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आ यदि॒षे नृ॒पतिं॒ तेज॒ आन॒ट्छुचि॒ रेतो॒ निषि॑क्तं॒ द्यौर॒भीके॑। अ॒ग्निः शर्ध॑मनव॒द्यं युवा॑नं स्वा॒ध्यं॑ जनयत्सू॒दय॑च्च ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ā yad iṣe nṛpatiṁ teja ānaṭ chuci reto niṣiktaṁ dyaur abhīke | agniḥ śardham anavadyaṁ yuvānaṁ svādhyaṁ janayat sūdayac ca ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

आ। यत्। इ॒षे। नृ॒ऽपति॑म्। तेजः॑। आन॑ट्। शुचि॑। रेतः॑। निऽसि॑क्तम्। द्यौः। अ॒भीके॑। अ॒ग्निः। शर्ध॑म्। अ॒न॒व॒द्यम्। युवा॑नम्। सु॒ऽआ॒ध्य॑म्। ज॒न॒य॒त्। सू॒दय॑त्। च॒ ॥

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:71» मन्त्र:8 | अष्टक:1» अध्याय:5» वर्ग:16» मन्त्र:3 | मण्डल:1» अनुवाक:12» मन्त्र:8


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर वह अध्यापक कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे युवते ! जैसे (द्यौः) प्रकाशस्वरूप (अग्निः) विद्युत् (अभीके) संग्राम में (इषे) इच्छा की पूर्णता के लिये (यत्) जो (निषिक्तम्) स्थापन किये हुए (शुचि) पवित्र (रेतः) वीर्य और (तेजः) प्रगल्भता को (आनट्) प्राप्त करती है, उससे युक्त तू वैसे (शर्धम्) बली (अनवद्यम्) निन्दारहित (युवानम्) युवावस्थावाले (स्वाध्यम्) उत्तम विद्यायुक्त विद्वान् (नृपतिम्) मनुष्यों में राजमान पति को स्वेच्छा से प्रसन्नतापूर्वक प्राप्त हो के (आजनयत्) सन्तानों को उत्पन्न (च) और अविद्या दुःख को (सूदयत्) दूर कर ॥ ८ ॥
भावार्थभाषाः - सब मनुष्यों जो जानना चाहिये कि कभी उत्तम विद्या वा प्रदीप्त अग्नि के समान विद्वान् के सङ्ग के विना व्यवहार और परमार्थ के सुख प्राप्त नहीं होते और अपने सन्तानों को विद्या देने के विना माता-पिता आदि कृतकृत्य नहीं हो सकते ॥ ८ ॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

तेजस्वितामय सुन्दर जीवन

पदार्थान्वयभाषाः - १. (यत्) = जब (नृपतिम्) = ‘ना चासौ पतिश्च’ प्रगतिशील व इन्द्रियों के स्वामी व्यक्ति को (इषे) = अन्न पाचन के लिए (आनट्) = जाठरग्निरूप (तेजः) = तेज (आ) = सर्वथा प्राप्त होता है । यह (रेतः) = शक्ति (अभीके) = संग्राम में (द्यौः) = [दिव् - विजिगीषा] सब काम - क्रोधादि शत्रुओं को जीतने की कामनावाली होती है । संक्षेप में [क] नृपति को अन्नपाचन के लिए जाठराग्नि को तेज प्राप्त होता है, [ख] अन्नपरिपाक से उत्पन्न शक्ति उसके शरीर में ही सिक्त होती है, [ग] इस शक्ति से यह क्रोधादि पर विजय पाता है । २. पूर्वोक्त तीन पद रखनेवाला (अग्निः) = प्रगतिशील जीव को अपने को (शर्धम्) = बलवान् (अनवद्यम्) = प्रशस्त जीवनवाला (युवानम्) = तरुण अथवा बुराइयों से अपने को दूर करनेवाला तथा अच्छाइयों को अपने से मिलानेवाला (स्वाध्यम्) = शोभनयज्ञ व शोभन कर्मोंवाला (जनयत्) = बनाता है (च) = और (सूदयत्) = अपने को सदा यज्ञादि उत्तम कर्मों में प्रेरित करता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - अग्नि - प्रगतिशील जीव तेजस्विता का सम्पादन करके अपने जीवन को प्रशस्त बनाता है ।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनः स कीदृश इत्युपदिश्यते ॥

अन्वय:

हे युवते ! त्वं यथा द्यौरग्निरभीके इषे यन् निषिक्तं शुचि रेतस्तेजश्चानट् समन्तात् प्रापयति तेन युक्ता त्वं तथा शर्धमनवद्यं स्वाध्यं युवानं नृपतिं विद्वांसं स्वयंवरविवाहेन प्राप्यापत्यान्याजनयद् दुःखं सूदयच्च ॥ ८ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - (आ) समन्तात् (यत्) यः (इषे) इच्छापूर्त्तये (नृपतिम्) राजानम् (तेजः) प्रागल्भ्यम् (आनट्) व्याप्नोति। अत्र व्यत्ययेन परस्मैपदं श्नम् च। (शुचि) पवित्रम् (रेतः) वीर्य्यमुदकं वा। रेत इत्युदकनामसु पठितम्। (निघं०१.१२) (निषिक्तम्) संस्थापितम् (द्यौः) प्रकाशः (अभीके) संग्रामे। अभीक इति संग्रामनामसु पठितम्। (निघं०२.१७) (अग्निः) विद्युत् (शर्धम्) बलिनम् (अनवद्यम्) अनिन्दितम् (युवानम्) (स्वाध्यम्) सुष्ठु समन्ताद् विद्याऽधीयते यस्मिन् यस्यां तं वा (जनयत्) (सूदयत्) सूदयेत् (च) समुच्चये ॥ ८ ॥
भावार्थभाषाः - अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। न सर्वैर्मनुष्यैः कदाचित्सुविद्या शरीरबलाभ्यां विना व्यावहारिकपारमार्थिकसुखे प्राप्येते। न खलु सन्तानेभ्यो विद्यादानेन विना मातापित्रादयोऽनृणा भवितुं शक्नुवन्तीति वेद्यम् ॥ ८ ॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - When pure light and lustre, living and sanctified, come to the ruling soul for the fulfilment of desire and perfection, then Agni creates the strong, praiseworthy, healthy and self-dependent youth, perfects and guides him in the battle of life.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

अन्वय:

O young woman, as the glorious electricity causes pure virility and vigour for the fulfilment of noble desires in the battle, so thou should be endowed with that vigour and should marry a robust, irreproachable, intelligent, learned young protector of the people as thy husband according to the law of Svayamvara (Mutual choice) should beget virile children and dispel all misery.

पदार्थान्वयभाषाः - (द्यौ:) प्रकाश: = Light, here radiant or glorious. (अभीके) संग्रामे अभीक इति संग्राम नाम (निध०२.१७) (अग्निः) विद्युत् = Electricity.
भावार्थभाषाः - Men should know well that none can get worldly and strength. The parents cannot be free from their debts without giving proper education to their children.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - सर्व माणसांनी हे जाणावे की उत्तम विद्या शरीरबलयुक्त प्रदीप्त अग्नीप्रमाणे विद्वानांच्या संगतीशिवाय कधी व्यवहार व परमार्थाचे सुख प्राप्त होत नाही व आपल्या संतानांना विद्या दिल्याखेरीज माता-पिता इत्यादी कृतकृत्य होऊ शकत नाहीत. ॥ ८ ॥